उगना महादेव

(भक्ति, प्रेम और भगवान् शिव की सहज करुणा की एक लोककथा)


डॉ धनंजय कुमार मिश्र ,विभागाध्यक्ष संस्कृत,एस के एम विश्वविद्यालय दुमका झारखंड 

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मिथिलांचल की धरती केवल अपनी उर्वरता, लोकसंस्कृति और मधुर भाषा के लिए ही विख्यात नहीं है, बल्कि उसकी मिट्टी में भक्ति की ऐसी सुगन्ध भी बसी है, जो सदियों से जनमानस को सुवासित करती आ रही है। यहाँ के खेतों में धान की बालियाँ जितनी सहजता से लहलहाती हैं, उतनी ही सहजता से लोकजीवन में शिव और शक्ति के प्रति श्रद्धा की धारा प्रवाहित होती है। मिथिला के कण-कण में महादेव की स्मृतियाँ हैं और उसके लोकगीतों में आज भी उस अनन्य भक्त की कथा गूँजती है, जिसके प्रेम ने स्वयं कैलासपति को अपना सेवक बना लिया था। वह भक्त थे महाकवि विद्यापति और उनके सेवक थे उगना—जो वस्तुतः कोई साधारण मनुष्य नहीं, साक्षात् भगवान् शिव थे।

यह कथा केवल एक भक्त और भगवान् की नहीं, बल्कि उस प्रेम की है, जिसमें ईश्वर अपने भक्त के सामने अपना ऐश्वर्य भूल जाते हैं; उस विश्वास की है, जिसमें भगवान् अपने भक्त के घर चाकरी करने लगते हैं; और उस मानवीय दुर्बलता की भी, जो कभी-कभी अपने ही हाथों अपने सौभाग्य को खो देती है।

*जब भक्ति ने भगवान् को बाँध लिया*

मिथिला की धरती पर महाकवि विद्यापति का नाम बड़े आदर से लिया जाता था। उनकी वाणी में सरस्वती का वास था, हृदय में राधा-कृष्ण के प्रेम की मधुरता थी और आत्मा में भगवान् शिव के प्रति अनन्य अनुराग। वे शब्दों के ऐसे साधक थे, जिनकी कविता राजमहलों से लेकर गाँव की चौपालों तक गूँजती थी। उनके पदों में प्रेम था, विरह था, करुणा थी और जीवन के सूक्ष्मतम भावों को छू लेने वाली संवेदना थी।

किन्तु उनके व्यक्तित्व का सबसे उज्ज्वल पक्ष उनकी भक्ति थी। वे भगवान् शिव को केवल मंदिर के गर्भगृह में प्रतिष्ठित देवता नहीं मानते थे। उनके लिए शिव अपने थे—अत्यन्त निकट, आत्मीय और हृदय के सहचर। वे कभी उनसे विनय करते, कभी रूठते, कभी अपनी व्यथा सुनाते और कभी प्रेमपूर्वक उलाहना भी दे बैठते।

उनकी भक्ति में भय का स्थान नहीं था; वहाँ आत्मीयता थी। उनके लिए महादेव केवल त्रिलोचन, नीलकण्ठ और गंगाधर नहीं थे, वे ऐसे सखा थे, जिनसे मन की प्रत्येक बात कही जा सकती थी।

कहते हैं, भगवान् शिव अपने भक्त की इसी निष्कपट भक्ति से अत्यन्त प्रसन्न हुए। कैलास पर बैठे-बैठे उन्हें लगा कि जिस भक्त का हृदय संसार के छल-प्रपंच से दूर इतना निर्मल है, उसके समीप रहकर ही उसके प्रेम का वास्तविक आनन्द लिया जा सकता है।

एक दिन उन्होंने अपना दिव्य रूप त्यागा और एक साधारण ग्रामीण का वेश धारण कर लिया। बिखरे बाल, मैले वस्त्र, भोला चेहरा और बातचीत में ऐसी गंवई सरलता कि देखने वाला उन्हें बुद्धि से कुछ कम ही समझे। वे विद्यापति के घर पहुँचे और हाथ जोड़कर बोले, “मालिक, सुना है आपके यहाँ काम करने के लिए एक आदमी की आवश्यकता है। मुझे रख लीजिए। जो कहेंगे, करूँगा। खाने को रूखी-सूखी रोटी मिल जाए और सिर छिपाने की जगह, तो आपकी सेवा में रह जाऊँगा।”

विद्यापति ने उस अपरिचित को ऊपर से नीचे तक देखा। उसके चेहरे पर ऐसी निष्कपटता थी कि कवि का मन पसीज गया।

उन्होंने पूछा, “क्या नाम है तुम्हारा?”

“उगना,” उसने सहज भाव से उत्तर दिया।

“काम-काज जानते हो?”

उगना ने सिर खुजलाते हुए कहा, “मालिक, बहुत बड़े-बड़े काम तो नहीं जानता। लेकिन जो काम बता दीजिएगा, उसे करने में जी नहीं चुराऊँगा।”

विद्यापति मुस्कराए। उन्हें क्या मालूम था कि संसार के समस्त कर्मों के नियन्ता स्वयं उनके द्वार पर खड़े हैं!

“अच्छा, आज से यहीं रहो। घर का काम सँभालना और मेरी आवश्यकता का ध्यान रखना।”

उगना ने हाथ जोड़ दिए। उसके अधरों पर एक ऐसी मुस्कान खिली, जिसे कोई साधारण दृष्टि पढ़ नहीं सकती थी।

इस प्रकार महादेव विद्यापति के सेवक बन गए।

* सेवक के रूप में कैलासपति*

उगना की दिनचर्या बड़ी विचित्र थी। वह सुबह सबसे पहले उठता, घर का आँगन बुहारता, जल भरता, आवश्यक वस्तुएँ जुटाता और विद्यापति के लिए भोजन-पानी की व्यवस्था करता। वह बहुत अधिक बोलता नहीं था, लेकिन जब बोलता, तो उसकी भोली बातें सुनकर घर के लोग हँस पड़ते।

कभी वह किसी काम में देर कर देता, कभी किसी बात को अपने ही ढंग से समझता, पर उसकी निष्ठा में कोई कमी नहीं थी। विद्यापति को धीरे-धीरे उससे ऐसा स्नेह हो गया कि वे उसे केवल नौकर नहीं, अपना विश्वासी साथी समझने लगे।

उगना भी अपने स्वामी की सेवा में सदैव तत्पर रहता। विद्यापति कहीं जाते, तो वह उनके साथ चल पड़ता। कवि राजदरबार जाते, किसी विद्वान् से मिलने जाते या किसी आवश्यक कार्य से बाहर निकलते, उगना उनके पीछे-पीछे रहता। रास्ते भर वह कभी उनके वस्त्र सँभालता, कभी उनका सामान उठाता और कभी उनकी बातों पर भोलेपन से सिर हिलाता रहता।

विद्यापति जब काव्य, दर्शन या भक्ति की चर्चा करते, तो उगना चुपचाप सुनता। कभी-कभी वह ऐसी दृष्टि से अपने स्वामी को देखता, मानो उनके प्रत्येक शब्द में उसे कोई गहरी अनुभूति हो रही हो।

एक दिन विद्यापति ने हँसकर पूछा, “उगना, मेरी बातें समझ में भी आती हैं या बस यों ही सिर हिलाते रहते हो?”

उगना ने विनम्रता से कहा, “मालिक, आपकी बातें समझने की मेरी क्या बिसात! लेकिन आपका मुँह देखता हूँ, तो लगता है कि कुछ अच्छा ही सुन रहा हूँ।”

विद्यापति ठठाकर हँस पड़े।

उन्हें क्या पता था कि वेदों के मर्मज्ञ, योगियों के आराध्य और समस्त ज्ञान के अधिष्ठाता उनके सामने खड़े होकर उनकी बातें सुन रहे हैं!

भगवान् के लिए यह कैसी अद्भुत लीला थी! जिस संसार में लोग उन्हें पाने के लिए वर्षों तपस्या करते हैं, उसी संसार में वे अपने भक्त के घर साधारण सेवक बनकर रह रहे थे। उन्हें न राजसिंहासन चाहिए था, न स्वर्णमुकुट, न देवताओं की स्तुति। उन्हें तो केवल अपने भक्त के निकट रहने का आनन्द चाहिए था।

प्रेम जब सच्चा होता है, तब ऊँच-नीच की दीवारें अपने आप गिर जाती हैं। भगवान् और भक्त के बीच भी नहीं रहती कोई दूरी—रह जाता है तो केवल विश्वास।

*जेठ की दोपहरी और गंगाजल*

एक दिन की बात है। विद्यापति को किसी आवश्यक कार्य से राजदरबार जाना था। उन्होंने अपने वस्त्र सँभाले, आवश्यक सामग्री एक झोले में रखी और उगना को साथ लेकर चल पड़े।

जेठ का महीना था। सूर्यदेव मानो आकाश से आग बरसा रहे थे। धरती तपकर तवे की तरह गर्म हो गई थी। दूर तक फैले खेतों में हरियाली का नामोनिशान नहीं था। कहीं कोई वृक्ष नहीं, जिसकी छाया में दो घड़ी बैठकर विश्राम किया जा सके। हवा भी चलती, तो अपने साथ शीतलता नहीं, गर्मी का थपेड़ा लेकर आती।

विद्यापति धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे। उम्र और धूप दोनों उनके कदमों को भारी कर रहे थे। उनके कण्ठ में प्यास की तीव्रता बढ़ती जा रही थी। कुछ दूर चलने के बाद वे रुक गए।

“उगना!” उन्होंने व्याकुल स्वर में पुकारा।

“जी, मालिक!”

“अब मुझसे चला नहीं जाता। कण्ठ सूख रहा है। ऐसा लगता है, जैसे भीतर आग लगी हो। कहीं से थोड़ा पानी ले आओ।”

उन्होंने अपने झोले से लोटा निकालकर उगना की ओर बढ़ा दिया।

उगना ने चारों ओर दृष्टि दौड़ाई। दूर-दूर तक न कोई कुआँ था, न तालाब और न ही नदी की कोई धारा। धरती सूनी थी और आकाश निर्दय। लेकिन जिस व्यक्ति को तीनों लोकों में जल की कमी नहीं हो सकती, उसके लिए यह कैसी कठिनाई!

उगना ने कहा, “मालिक, आप यहीं किसी छाया में बैठिए। मैं अभी पानी लेकर आता हूँ।”

“जल्दी आना, उगना। अब प्यास सहन नहीं होती।”

उगना एक झाड़ी की ओट में चला गया। वहाँ पहुँचकर उसने चारों ओर देखा। अगले ही क्षण उसके भीतर छिपा दिव्य स्वरूप जाग उठा। जटाओं में विराजमान पवित्र गंगा की धारा से उसने एक लोटा गंगाजल निकाला और उसे लेकर लौट आया।

“मालिक, बड़ी दूर जाना पड़ा। आसपास कहीं पानी नहीं मिला। यह लीजिए।”

विद्यापति ने अधीरता से लोटा लिया। प्यास इतनी तीव्र थी कि उन्होंने एक ही साँस में सारा जल पी लिया। जल कण्ठ से उतरते ही उन्हें एक विचित्र शीतलता का अनुभव हुआ। शरीर की थकान जैसे क्षणभर में दूर हो गई। मन में शान्ति उतर आई और हृदय में एक अनोखी तृप्ति भर गई।

उन्होंने लोटे को देखा, फिर उगना की ओर दृष्टि उठाई।

“उगना, एक बात बताओ।”

“पूछिए, मालिक।”

“यह जल साधारण जल नहीं था। इसका स्वाद कुछ और ही है। यह तो गंगाजल है!”

उगना एक क्षण के लिए चुप हो गया।

विद्यापति की दृष्टि तीक्ष्ण हो उठी। वे बोले, “इस निर्जन मार्ग में, जहाँ दूर-दूर तक नदी, कुआँ या तालाब नहीं, वहाँ तुम इतनी जल्दी गंगाजल कहाँ से ले आए? गंगाजल तो भगवान् शिव की जटाओं में भी है। सच-सच बताओ, तुम कौन हो?”

उगना ने सिर झुका लिया।

जिस रहस्य को वह इतने दिनों से अपने भीतर सँजोए हुए था, वह अब अधिक देर तक छिप नहीं सकता था।

विद्यापति उसके निकट आए। उनके स्वर में आश्चर्य भी था और आग्रह भी।

“उगना, मुझसे कुछ छिपाओ मत। तुम्हारी आँखों में जो तेज है, वह किसी साधारण मनुष्य का नहीं। बताओ, तुम वास्तव में कौन हो?”

उगना ने चारों ओर देखा। फिर धीरे से बोला, “मालिक, आपने पहचान ही लिया है, तो अब छिपाने से क्या लाभ! लेकिन मेरी एक विनती है—इस रहस्य को अपने हृदय में ही रखना।”

इतना कहकर उसने अपनी आँखें मूँद लीं।

अगले ही क्षण उस साधारण ग्रामीण का रूप विलीन होने लगा। जटाओं से सुशोभित मस्तक, ललाट पर तीसरा नेत्र, गले में नाग, शरीर पर भस्म, हाथ में त्रिशूल और मुखमण्डल पर अलौकिक तेज! वहाँ कोई सेवक नहीं खड़ा था। साक्षात् कैलासपति महादेव अपनी दिव्य छटा में प्रकट थे।

विद्यापति स्तब्ध रह गए। उनके हाथ काँपने लगे। आँखों से अश्रुधारा बह निकली। वे भूमि पर गिर पड़े और भगवान् के चरणों को पकड़ लिया।

“प्रभो! यह मेरा कैसा सौभाग्य! जिनके दर्शन के लिए ऋषि-मुनि तपस्या करते हैं, वे स्वयं मेरे घर सेवक बनकर रहे! मैं कितना अभागा हूँ कि इतने दिनों तक आपको पहचान न सका!”

महादेव ने स्नेहपूर्वक उन्हें उठाया।

“विद्यापति, तुम्हारी भक्ति ने ही मुझे यहाँ खींचा है। तुमने मुझे कभी दूर नहीं समझा, इसलिए मैं तुम्हारे पास चला आया। तुम्हारे प्रेम में जो आत्मीयता है, वही मुझे प्रिय है।”

विद्यापति के कण्ठ से शब्द नहीं निकल रहे थे। वे बार-बार भगवान् के चरणों में झुकते और उन्हें निहारते।

महादेव ने उनके कन्धे पर हाथ रखकर कहा, “लेकिन एक बात याद रखना। मेरे इस स्वरूप का रहस्य किसी को मत बताना। मैं तुम्हारे साथ उसी प्रकार रहना चाहता हूँ, जैसे अब तक रहा हूँ।”

विद्यापति ने हाथ जोड़कर कहा, “जैसी आपकी आज्ञा, प्रभो! यह रहस्य मेरे हृदय में सुरक्षित रहेगा।”

भगवान् पुनः उगना के उसी सरल रूप में आ गए। दोनों आगे बढ़ चले। लेकिन अब विद्यापति के लिए संसार पहले जैसा नहीं रह गया था। जिस सेवक के साथ वे वर्षों से चलते आए थे, उसी में उन्हें अपने आराध्य का दर्शन हुआ था। उनकी आँखों में बार-बार आँसू भर आते। वे उगना को देखते और मन-ही-मन सोचते—जिसे संसार साधारण समझता है, उसमें भी ईश्वर का निवास हो सकता है।

*परीक्षा की घड़ी*

समय अपनी गति से आगे बढ़ता रहा। विद्यापति के घर में उगना पहले की तरह काम करता रहा। वह कभी आँगन साफ करता, कभी भोजन की व्यवस्था करता और कभी स्वामी के साथ बाहर चला जाता। लेकिन अब विद्यापति की दृष्टि बदल चुकी थी। वे उगना में केवल सेवक नहीं, अपने आराध्य के दर्शन करते थे।

फिर भी उन्होंने भगवान् को दिया हुआ वचन निभाया। उन्होंने किसी से उस रहस्य की चर्चा नहीं की।

घर में विद्यापति की पत्नी सुशीला थीं। वे गृहस्थी के कामों में व्यस्त रहतीं। उनके लिए उगना घर का एक सेवक था, जिसे काम समय पर करना चाहिए और जिसके ऊपर घर की व्यवस्था निर्भर करती थी।

एक दिन सुशीला ने उगना को कोई काम सौंपा। घर में कई काम एक साथ आ पड़े थे। उगना को उस काम को पूरा करने में कुछ देर हो गई।

सुशीला पहले से ही व्यस्त थीं। काम में विलम्ब देखकर उनका क्रोध बढ़ गया।

“उगना! तुम्हें कितनी बार कहा है कि काम समय पर किया करो! जब देखो, तब अपनी ही धुन में लगे रहते हो। घर का काम कोई खेल नहीं है!”

उगना चुपचाप खड़ा रहा।

“सुनाई नहीं देता? कितनी देर से बुला रही हूँ!”

उगना ने विनम्र स्वर में कहा, “मालकिन, अभी कर देता हूँ।”

“अभी कर देता हूँ! यही तुम्हारा रोज का उत्तर है। आखिर तुम करते क्या हो?”

सुशीला का क्रोध बढ़ता गया। उन्होंने पास पड़ी झाड़ू उठा ली और उगना को मारने लगीं। झाड़ू की चोट पड़ती रही। उगना चुपचाप सहता रहा। न उसने प्रतिकार किया, न कोई कठोर शब्द कहा। वह केवल अपने स्वामी के घर की मर्यादा बनाए रखना चाहता था। परन्तु यह दृश्य अधिक देर तक छिपा न रह सका। उसी समय विद्यापति वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने देखा कि सुशीला उगना को झाड़ू से मार रही हैं और उगना बिना कुछ कहे मार खा रहा है। उनका हृदय काँप उठा। जिस महादेव के चरणों में देवता अपना मस्तक झुकाते हैं, जिनके नाम का स्मरण करके मनुष्य अपने दुःख भूल जाता है, वे आज उनके घर में अपमानित हो रहे थे! विद्यापति से रहा नहीं गया। वे तीव्र स्वर में बोले, “सुशीला! यह क्या कर रही हो? हाथ रोको!”

सुशीला ने क्रोध में कहा, “आप बीच में मत पड़िए। यह आदमी कोई काम ठीक से नहीं करता। कितनी बार समझाया, फिर भी इसकी आदत नहीं सुधरती!”

विद्यापति ने व्याकुल होकर कहा, “तुम जानती भी हो कि तुम किसे मार रही हो?”

“किसे मार रही हूँ? आपके इसी सेवक को! अब क्या इसे कुछ कहने का भी अधिकार नहीं?”

विद्यापति का धैर्य टूट गया। वे भावावेश में बोल उठे, “अरी, नासमझ! जिसे तुम साधारण सेवक समझकर मार रही हो, वे कोई सामान्य मनुष्य नहीं हैं। ये साक्षात् भगवान् शिव हैं! स्वयं महादेव हमारे घर में उगना बनकर रह रहे हैं!”

शब्द उनके मुख से निकल चुके थे। एक क्षण के लिए वातावरण स्तब्ध हो गया। सुशीला के हाथ से झाड़ू छूटकर भूमि पर गिर पड़ी। उनका चेहरा भय, विस्मय और अविश्वास से भर गया। वे कभी अपने पति को देखतीं, कभी उगना को।

“भगवान् शिव?” उनके मुख से केवल इतना ही निकला।

विद्यापति ने उगना की ओर देखा। उनकी आँखों में पश्चात्ताप था। उन्हें उसी क्षण अपनी भूल का बोध हो गया। उन्होंने भगवान् से वचन दिया था कि इस रहस्य को गुप्त रखेंगे, लेकिन क्रोध और आवेग में वे उस वचन को भूल गए।

उन्होंने काँपते स्वर में कहा, “प्रभो! मुझसे अपराध हो गया। मैं अपने क्रोध को रोक नहीं पाया। मुझे क्षमा कर दीजिए!”

लेकिन उगना के मुख पर अब वह परिचित मुस्कान नहीं थी।

वह कुछ क्षण मौन रहा। फिर उसकी आँखों में करुणा उतर आई। उसने विद्यापति की ओर देखा, मानो कह रहा हो—भक्त, तुमने मुझे प्रेम से पाया था, लेकिन अब मेरे वचन की मर्यादा टूट गई है।

अगले ही क्षण वहाँ एक अद्भुत प्रकाश फैला।

उगना का रूप धीरे-धीरे ओझल होने लगा। विद्यापति ने आगे बढ़कर उसके चरण पकड़ने चाहे, लेकिन उनके हाथ रिक्त रह गए।

“उगना! प्रभो! महादेव!”

उनकी करुण पुकार वातावरण में गूँजती रही। किन्तु भगवान् अन्तर्धान हो चुके थे।

*विरह में डूबा भक्त*

जिस घर में कुछ क्षण पहले तक भगवान् अपने सेवक के रूप में उपस्थित थे, वहाँ अब एक गहरा सन्नाटा छा गया। सुशीला स्तब्ध खड़ी थीं। उन्हें अपनी भूल का बोध होने लगा। जिस व्यक्ति को वे साधारण नौकर समझती थीं, वह स्वयं देवाधिदेव था। जिस पर उन्होंने क्रोध में हाथ उठाया, वह करुणा और क्षमा का सागर था। उनके नेत्रों से आँसू बह निकले। “स्वामी, मुझसे बड़ा अपराध हो गया। मैंने उन्हें पहचाना नहीं। मैंने उन्हें अपमानित किया। क्या अब वे कभी लौटेंगे?”

विद्यापति के पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं था। उनके भीतर पश्चात्ताप का तूफान उठ रहा था। वे बार-बार उस क्षण को याद करते, जब भगवान् ने उन्हें अपना दिव्य स्वरूप दिखाया था। वे याद करते कि किस प्रकार महादेव ने उन्हें उठाकर अपने हृदय से लगाया था और रहस्य को गुप्त रखने का आग्रह किया था। उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।

“प्रभो,” वे मन-ही-मन कहते, “आपने मेरे जैसे तुच्छ भक्त के लिए कितनी बड़ी कृपा की! मैं आपके चरणों की सेवा करने योग्य भी नहीं था, फिर भी आपने मेरे घर रहकर मुझे अपना स्नेह दिया। आपने मेरी प्यास बुझाई, मेरी थकान बाँटी और मेरे जीवन को धन्य किया। किन्तु मैं अपने ही आवेग पर नियन्त्रण नहीं रख सका। आपने जो विश्वास मुझे सौंपा था, मैं उसकी रक्षा न कर पाया।”

उस दिन के बाद विद्यापति का जीवन बदल गया। घर का प्रत्येक कोना उन्हें उगना की याद दिलाता। जहाँ वह बैठता था, वहाँ उन्हें उसकी छवि दिखाई देती। जहाँ वह जल रखता था, वहाँ उन्हें गंगाजल की शीतलता का स्मरण होता। आँगन में झाड़ू की हल्की-सी आवाज सुनकर भी उनका हृदय भर आता। कभी वे अनायास पुकार उठते, “उगना, जरा इधर आना!” लेकिन उत्तर में केवल मौन मिलता। वे जानते थे कि भगवान् सर्वव्यापी हैं, फिर भी अपने सखा के रूप में उनकी अनुपस्थिति उन्हें भीतर तक व्याकुल कर देती। ईश्वर का तत्त्व समझना एक बात है और उनके सान्निध्य का विरह सहना दूसरी। भक्ति में मिलन जितना मधुर होता है, विरह उतना ही गहरा। विद्यापति के लिए अब प्रत्येक दिन स्मृति और पश्चात्ताप का दिन था। फिर भी उनकी श्रद्धा कम नहीं हुई। उन्होंने अपने आराध्य को दोष नहीं दिया, न अपनी भक्ति का प्रतिफल माँगा। वे केवल अपने अपराध को स्मरण करते और भगवान् के प्रति अपनी निष्ठा को और गहरा करते गए।

कहते हैं, भगवान् शिव अपने भक्त से दूर होकर भी उससे विमुख नहीं होते। उनका अन्तर्धान होना प्रेम का अन्त नहीं था; वह उस लीला का विराम था, जिसने संसार को भक्ति का एक अनुपम पाठ पढ़ाया।

*उगना महादेव की महिमा*

लोकमानस में यह विश्वास प्रचलित है कि जिस स्थान पर भगवान् शिव ने विद्यापति को अपना दिव्य स्वरूप दिखाया था, वही स्थान आगे चलकर उगना महादेव के नाम से विख्यात हुआ। वहाँ श्रद्धालुओं ने शिव के उस अद्भुत रूप की स्मृति को सँजोया, जिसमें महादेव ने देवत्व के समस्त बाहरी वैभव को छोड़कर एक साधारण सेवक का जीवन स्वीकार किया था।

मिथिला की धरती पर उगना महादेव की कथा आज भी लोकगीतों, जनश्रुतियों और भक्तों की स्मृतियों में जीवित है। श्रद्धालु वहाँ जाकर भगवान् के दर्शन करते हैं, जल अर्पित करते हैं और उस अनोखी लीला का स्मरण करते हैं, जिसमें भक्ति ने स्वयं भगवान् को मनुष्य के घर तक पहुँचा दिया था।

इस कथा की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि इसमें शिव केवल संहारकर्ता या वरदाता के रूप में नहीं आते। वे एक सेवक हैं—जो अपने भक्त की प्यास बुझाते हैं, उसकी थकान में उसके साथ चलते हैं और बिना किसी प्रतिदान की अपेक्षा के उसके जीवन का हिस्सा बन जाते हैं।

उनके लिए भक्त की सेवा कोई छोटा काम नहीं। वे यह नहीं देखते कि कौन राजमहल में रहता है और कौन झोपड़ी में; कौन वेदों का ज्ञाता है और कौन निरक्षर; कौन स्वर्णपात्र में जल अर्पित करता है और कौन मिट्टी के पात्र में। वे हृदय की निर्मलता देखते हैं।

उगना की कथा हमें यह भी सिखाती है कि किसी मनुष्य को उसके बाहरी रूप, वेशभूषा, भाषा या सामाजिक स्थिति के आधार पर छोटा नहीं समझना चाहिए। सम्भव है, जिसे हम साधारण समझकर उपेक्षित कर रहे हों, वही अपने भीतर असाधारण गुणों का भण्डार रखता हो। मनुष्य की वास्तविक पहचान उसके पद या प्रतिष्ठा में नहीं, उसके आचरण, करुणा और सत्यनिष्ठा में होती है।

सुशीला की भूल केवल भगवान् को न पहचान पाने की भूल नहीं थी। वह उस दृष्टि की भूल भी थी, जो किसी सेवक की मानवीय गरिमा को उसके काम से कम आँकती है। घर में काम करने वाला व्यक्ति भी सम्मान का अधिकारी है। उससे भूल हो सकती है, उससे काम में देर हो सकती है, लेकिन उसके साथ अपमानजनक व्यवहार करना उचित नहीं। सेवा करने वाले हाथ भी उतने ही सम्माननीय हैं, जितने आदेश देने वाले हाथ।

विद्यापति की भूल भी हमें एक गम्भीर शिक्षा देती है। प्रेम और भक्ति के साथ संयम आवश्यक है। कभी-कभी सत्य को प्रकट करने की अधीरता या भावनाओं का अनियन्त्रित आवेग ऐसे परिणाम उत्पन्न कर देता है, जिन्हें बाद में सुधारा नहीं जा सकता। वचन की मर्यादा, विवेक और आत्मसंयम जीवन के अनिवार्य गुण हैं।

किन्तु इस कथा का सबसे सुन्दर संदेश भगवान् शिव की करुणा में छिपा है। वे अपने भक्त के अपराध से बड़े हैं, उसके पश्चात्ताप को समझते हैं और उसके प्रेम का मूल्य जानते हैं। उनका सान्निध्य भले ही प्रत्यक्ष रूप में समाप्त हो गया हो, उनकी कृपा की स्मृति भक्त के जीवन को आलोकित करती रहती है।

*भक्ति का शाश्वत आलोक*

संध्या उतरती है। मिथिला के किसी गाँव में मंदिर की घंटियाँ बजती हैं। धूप की सुगन्ध हवा में घुलती है। शिवलिंग पर जल की धार गिरती है और किसी वृद्ध भक्त के कण्ठ से स्वर उठता है—हर-हर महादेव! उस स्वर में केवल आराधना नहीं, विद्यापति की स्मृति भी है; उगना की सरलता भी है और उस दिव्य प्रेम की अनुभूति भी, जिसने भगवान् को सेवक बना दिया था।

कल्पना कीजिए, यदि उगना आज भी किसी गाँव की पगडंडी पर साधारण वस्त्र पहने, कन्धे पर झोला लटकाए, किसी प्यासे राहगीर को जल पिलाता हुआ मिल जाए, तो क्या हम उसे पहचान पाएँगे? शायद नहीं। हम उसके वेश को देखेंगे, उसकी भाषा पर हँसेंगे और उसकी साधारणता को उसकी सीमा समझ बैठेंगे। लेकिन भक्ति की दृष्टि हमें सिखाती है कि ईश्वर का वैभव सदा चमकते मुकुटों में नहीं दिखाई देता; कभी वह किसी थके हुए पथिक के लिए बढ़े हुए हाथ में भी प्रकट होता है।

महादेव की महिमा इसी में है कि वे अपने भक्त के लिए सब कुछ छोड़ सकते हैं। वे कैलाश के स्वामी होकर भी सेवक बन सकते हैं, गंगाधर होकर भी प्यासे को जल पिला सकते हैं और जगत् के नियन्ता होकर भी अपने भक्त के प्रेम के अधीन हो सकते हैं।

विद्यापति और उगना की कथा इसी सत्य की अमर घोषणा है—ईश्वर को पाने के लिए केवल कठिन तपस्या ही आवश्यक नहीं; निर्मल हृदय, निष्कपट प्रेम और अटूट विश्वास भी पर्याप्त हैं।

भगवान् शिव को यदि किसी एक भाव में बाँधना सम्भव हो, तो वह भाव है—करुणा। वे भोलेनाथ हैं, क्योंकि वे भक्त के प्रेम पर सहज ही रीझ जाते हैं। वे आशुतोष हैं, क्योंकि निष्कपट समर्पण से शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं। वे महादेव हैं, क्योंकि उनकी महानता केवल उनके दिव्य सामर्थ्य में नहीं, बल्कि अपने भक्त के सामने विनम्र हो जाने में भी प्रकट होती है।

उगना महादेव का स्मरण हमें बार-बार यही कहता है कि भक्ति का सर्वोच्च रूप वह है, जहाँ अहंकार मिट जाता है, प्रेम शेष रह जाता है और सेवा पूजा बन जाती है।

जहाँ प्रेम है, वहाँ शिव हैं; जहाँ करुणा है, वहाँ शिव हैं; और जहाँ मनुष्य दूसरे मनुष्य की गरिमा पहचानता है, वहाँ भी शिव की ही चेतना आलोकित होती है।

हर-हर महादेव! जय उगना महादेव!

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