प्रतिमा

 


(एक घर की कहानी, जिसमें सब रहते थे, पर एक-दूसरे को समझता कोई नहीं था।)

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प्रतिमा पाँच भाई-बहनों में सबसे छोटी थी। पिता रामस्वरूप प्रसाद सरकारी महकमे में तृतीय श्रेणी के कर्मचारी थे। नौकरी ने उन्हें घर से दूर रखा और घर की जिम्मेदारियों ने उनकी पत्नी सावित्री देवी को कठोर बना दिया था। पिता शनिवार की देर शाम घर आते और सोमवार की भोर में लौट जाते। रविवार को कपड़े धुलते, राशन का हिसाब होता, बच्चों की शिकायतें सुनाई जातीं और घर के खर्च पर बहस होती। पिता कभी-कभी कुछ पूछते, फिर थकान का हवाला देकर सो जाते। घर में सब कुछ था—एक छत, रसोई, बच्चों के लिए बिस्तर और महीने के अंत में किसी तरह जुटा लिया जाने वाला राशन। बस, घर के लोगों के पास एक-दूसरे के मन की बात सुनने का समय नहीं था।


सावित्री देवी घर को अपने ढंग से चलाती थीं। उनका अनुशासन ही घर का संविधान था। किसे क्या पढ़ना है, किसे कितना खर्च करना है, कौन किससे बात करेगा—सबके अपने नियम थे। बच्चों के बीच तुलना होती, कभी किसी की प्रशंसा तो कभी किसी की अवमानना। पिता के बड़े भाई, शिवनारायण प्रसाद, पास ही रहते थे। दोनों भाइयों में वर्षों से अनबन थी। खेत की मेड़, पुश्तैनी हिस्से और किसी पुराने लेन-देन की बातें अब पारिवारिक कटुता बन चुकी थीं। बच्चे बड़े-बूढ़ों की बातें सुनते और अनजाने ही उस कटुता को अपने भीतर उतारते जाते।


प्रतिमा चुप रहती थी। वह देखती कि चाचा के घर कोई अच्छा कपड़ा पहन ले तो माँ कहतीं, “दिखावा बहुत है, घर की असलियत भगवान जानते हैं।” चाचा के घर से कोई मिठाई आ जाए तो माँ उसे बच्चों में बाँटते हुए भी कोई न कोई व्यंग्य कर देतीं। पिता कभी विरोध करते तो माँ उलटे उन्हें ही सुना देतीं, “आपको घर की क्या खबर? साल में चार दिन आते हैं और मुझे घर चलाना सिखाते हैं!”


पिता चुप हो जाते।


प्रतिमा सोचती, क्या घर ऐसे ही चलते हैं? क्या अपने ही लोगों से नाराज रहना भी परिवार का हिस्सा है?


उसने कई बार माँ के पास बैठकर कुछ कहने की कोशिश की, लेकिन माँ की अपनी परेशानियाँ थीं। वे उसके सिर पर हाथ फेरकर कह देतीं, “अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है? ज्यादा मत सोचा करो। घर के काम सीखो, आगे काम आएँगे।”


प्रतिमा ने काम सीख लिया। मन की बात कहना नहीं सीखा।


बड़ी बहन कमला की शादी साधारण ढंग से हुई। पिता ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार सब किया और बेटी की विदाई के बाद राहत की साँस ली। दूसरी बहन विमला ने महाविद्यालय के एक गरीब लेकिन प्रतिभाशाली युवक, शशिकांत, को अपना जीवनसाथी चुना। पिता उस समय बाहर थे। सावित्री देवी ने बहुत विरोध के बाद मंदिर में दोनों का विवाह करा दिया। उन्हें डर था कि समाज क्या कहेगा, लेकिन उससे बड़ा डर यह था कि कहीं बेटी घर से भागकर कोई दूसरा कदम न उठा ले।


दोनों भाइयों, राजेश और महेश, ने इंटरमीडिएट के बाद नौकरी की तलाश शुरू कर दी। परिवार में किसी के पास इतना समय नहीं था कि प्रतिमा से पूछा जाता कि वह क्या बनना चाहती है। उसकी पढ़ाई चलती रही, फिर विवाह की चर्चा शुरू हो गई।


रामस्वरूप प्रसाद सेवानिवृत्त हो चुके थे। जमा पूँजी सीमित थी। दहेज की माँग सुनकर कई रिश्ते टूटे। अंततः एक किसान परिवार के युवक, रघुवीर, से प्रतिमा का विवाह तय हुआ। लड़का दिल्ली में एक कंपनी में काम करता था। आमदनी कम थी, लेकिन स्वभाव अच्छा बताया गया।


शादी के समय प्रतिमा की माँ ने उसके कान में कहा, “बेटी, गरीब घर है, मगर अपना घर है। निभाकर रहना।”


प्रतिमा ने सिर झुका लिया।


उसे लगा, जैसे जन्म से ही उसके हिस्से में एक ही सलाह लिख दी गई है—निभाकर रहना।


ससुराल पहुँचते ही उसे समझ में आ गया कि गरीब घर में बहू का स्वागत अक्सर फूलों से नहीं, अपेक्षाओं से होता है।


सास गंगादेवी ने पहले ही दिन उसकी साड़ी देखते हुए कहा, “तुम्हारे मायके वालों ने यही दिया है? आजकल तो गरीब भी बेटी को ठीक से विदा करते हैं।”


प्रतिमा ने कुछ नहीं कहा।


ननद सुशीला ने हँसकर जोड़ा, “भैया को तो दिल्ली में कमाने वाला घर चाहिए था, मिला भी क्या!”


गंगादेवी ने उसे घूरकर देखा। “अरे, सच कहने में क्या बुराई है? आजकल की लड़कियाँ दो दिन रोती हैं, फिर सब भूल जाती हैं।”


प्रतिमा उस रात बहुत देर तक जागती रही। पति पास में सो रहे थे। वह उनसे कहना चाहती थी कि उसे अपमानित किया गया है, लेकिन विवाह के शुरुआती दिनों में शिकायत करना उसे अच्छा नहीं लगा। उसने सोचा, शायद घर में सबका स्वभाव ऐसा ही है। समय के साथ सब ठीक हो जाएगा।


कुछ दिनों बाद रघुवीर दिल्ली लौट गए। प्रतिमा गाँव में रह गई। घर के काम बढ़ गए। सुबह अँधेरा रहते उठना, पशुओं के लिए चारा तैयार करना, आँगन बुहारना, चूल्हा जलाना, भोजन बनाना और फिर दिन भर के छोटे-बड़े काम। गलती हो जाए तो उलाहना; ठीक करे तो कोई विशेष प्रशंसा नहीं।


एक दिन दाल में नमक कुछ कम रह गया। गंगादेवी ने कटोरी सामने रखते हुए कहा, “जिस घर से आई हो, वहाँ शायद यही खाना बनता होगा।”


प्रतिमा की आँखें भर आईं।


“माँजी, अगली बार ध्यान रखूँगी।”


“हर बात में अगली बार! बहू हो या मेहमान? घर चलाना कोई खेल नहीं।”


सुशीला ने हँसते हुए कहा, “भाभी को दिल्ली भेज दीजिए। वहाँ जाकर बड़े लोगों की तरह रह लेंगी।”


उस दिन प्रतिमा ने पहली बार मन ही मन उत्तर दिया—दिल्ली में बड़े लोगों की तरह नहीं, अपने लोगों की तरह रहना चाहती हूँ।


लेकिन यह उत्तर भी उसके भीतर ही रह गया।


रघुवीर जब गाँव आते, प्रतिमा उनके लिए चाय बनाती, कपड़े रखती और रात को उनके पास बैठ जाती। वह शिकायत करना चाहती, पर हर बार बात बच्चों, खेती, राशन और दिल्ली की नौकरी पर आकर रुक जाती।


एक रात उसने हिम्मत करके कहा, “तुम्हारी माँ मुझसे बहुत नाराज रहती हैं।”


रघुवीर ने थकान भरे स्वर में पूछा, “किस बात पर?”


“कभी दहेज को लेकर, कभी काम को लेकर। मैं जो भी करती हूँ, कुछ न कुछ कमी निकाल देती हैं।”


रघुवीर ने उसे समझाया, “गाँव में सबका स्वभाव थोड़ा ऐसा ही है। तुम मन पर मत लिया करो। माँ बूढ़ी हैं, उनकी बातों का बुरा मानोगी तो घर कैसे चलेगा?”


प्रतिमा ने पति का चेहरा देखा। वह उससे प्रेम करती थी। उसे मालूम था कि रघुवीर बुरे आदमी नहीं हैं। उन्होंने कभी उसे मारा नहीं, कभी अपशब्द नहीं कहा। लेकिन वह यह भी समझ रही थी कि उसके अपमान को पति एक ऐसी छोटी बात मानते हैं, जिसे सह लेने में कोई विशेष हानि नहीं।


“तो क्या मैं ही गलत हूँ?” उसने पूछा।


“मैंने ऐसा कब कहा?”


“तुमने नहीं कहा। मगर हर बार मुझे ही समझाते हो।”


रघुवीर कुछ देर चुप रहे, फिर बोले, “मैं क्या करूँ? माँ से लड़ूँ? मैं बाहर रहकर कमाता हूँ। घर में शांति बनी रहे, यही चाहता हूँ।”


प्रतिमा ने उस रात अपनी शिकायत वापस ले ली। उसने सोचा, पति की परेशानी बढ़ाकर क्या मिलेगा?


समय के साथ उसने अपने भीतर एक आदत बना ली—अपमान को घटना समझना, फिर उसे भूलने का प्रयास करना और अंततः उसी घर में अगले दिन पहले से अधिक काम करना।


दिल्ली में जीवन आसान नहीं था। रघुवीर की आमदनी सीमित थी। एक छोटा-सा किराए का कमरा, साझा नल, गर्मियों में तपती छत और सर्दियों में दीवारों से आती ठंड। प्रतिमा भी उनके साथ दिल्ली आ गई। कुछ समय बाद पहला बच्चा हुआ, फिर दूसरा। घर की जिम्मेदारियाँ बढ़ गईं।


प्रतिमा ने हर रुपये का हिसाब रखा। बच्चों की फीस, दूध, दवा, किराया और राशन के बाद जो बचता, उसे वह भविष्य के लिए रख देती। अपने लिए कपड़े खरीदने की बारी आती तो कहती, “अभी पुरानी साड़ी चल जाएगी।”


रघुवीर कभी-कभी कहते, “अपने लिए भी कुछ लिया करो।”


वह मुस्कराकर उत्तर देती, “पहले बच्चों को ठीक कर लें। फिर अपने लिए भी देखेंगे।”


यह ‘फिर’ वर्षों तक नहीं आया।


बच्चों के नाम उसने अमित और सुमित रखे थे। वह चाहती थी कि वे अच्छी शिक्षा प्राप्त करें, किसी के सामने हाथ न फैलाएँ और किसी की आर्थिक हैसियत देखकर उनका सम्मान तय न हो। उसने उन्हें मेहनत करना सिखाया, लेकिन अपनी पीड़ा छिपाना भी शायद अनजाने में सिखा दिया।


अमित बैंक में अधिकारी बना। सुमित अभियंता हो गया। घर में पहली बार आर्थिक सुरक्षा आई। किराए के कमरे से निकलकर उन्होंने अपना अच्छा-सा फ्लैट लिया। बच्चों की नौकरियाँ लगीं तो रिश्तेदारों के फोन बढ़ गए। जिन लोगों ने कभी प्रतिमा के विवाह में कम दहेज की चर्चा की थी, वे अब उसके बच्चों की सफलता का उदाहरण देने लगे।


ससुराल में भी उसका सम्मान बढ़ा। अब जब वह गाँव जाती, तो उसके लिए विशेष भोजन बनता। सुशीला भाभी कहती, “भाभी, आपके हाथ का स्वाद ही अलग है।” गंगादेवी अब भी कभी-कभी पुराने ढंग से बोलतीं, लेकिन प्रतिमा उनकी बातों को अनसुना कर देती।


वह रिश्ते निभाना चाहती थी। हर शादी-ब्याह में उपहार देती, जरूरत पड़ने पर पैसे भेजती और बच्चों के लिए कपड़े खरीदती। उसे लगता था कि शायद इसी तरह पुराने दिनों की कड़वाहट धुल जाएगी।


लेकिन कुछ रिश्तों में व्यक्ति का योगदान याद रखा जाता है, उसका अपमान नहीं। और कुछ रिश्तों में योगदान भी धीरे-धीरे अधिकार समझ लिया जाता है।


प्रतिमा ने इस अंतर को देर से पहचाना।


एक दिन ससुराल से फोन आया। रघुवीर के चचेरे भाई के बेटे की शादी तय हुई थी। गाँव में बड़ा आयोजन होना था। घर में चर्चा थी कि शहर में रहने वाले रघुवीर और उनके बच्चों की ओर से अच्छा सहयोग मिलना चाहिए।


फोन पर गंगादेवी ने कहा, “इस बार शादी में कुछ ऐसा देना कि लोग याद रखें। अब तुम्हारे बच्चे बड़े अफसर हैं। तुम्हारी इज्जत भी तो हमारे घर से ही है।”


प्रतिमा ने सहज स्वर में कहा, “माँजी, हम अपनी सामर्थ्य के अनुसार करेंगे। बच्चों के भी अपने खर्च हैं।”


“अपने खर्च! अपने घर में शादी हो रही है और तुम्हें अपने खर्च याद आ रहे हैं?”


प्रतिमा ने पहली बार सीधे उत्तर दिया, “माँजी, हम हर अवसर पर मदद करते हैं। इस बार जितना उचित होगा, उतना करेंगे।”


कुछ देर सन्नाटा रहा। फिर गंगादेवी की आवाज कठोर हो गई।


“बहुत बदल गई हो तुम। जब आई थीं, तब तो कुछ था नहीं। अब पैसे आ गए तो रिश्ते छोटे लगने लगे?”


प्रतिमा का चेहरा तमतमा उठा। बीस वर्ष की मेहनत, अभाव, बच्चों की परवरिश और रिश्ते निभाने की कोशिश—सब जैसे एक वाक्य में मिटा दिए गए थे।


“मैंने कभी रिश्ते छोटे नहीं समझे, माँजी। मगर हर बार पैसे देकर ही रिश्ता निभाना जरूरी है क्या?”


उधर से उत्तर आया, “तो मत देना। किसने कहा है? हम भी देख लेंगे कि कौन कितना अपना है।”


फोन कट गया।


प्रतिमा देर तक मोबाइल पकड़े बैठी रही। वह रोई नहीं। उसके भीतर कुछ ऐसा था, जो आँसुओं से भी भारी हो गया था।


उसने रघुवीर को फोन किया। “तुम्हारी माँ से बात हुई है?”


“हाँ, उन्होंने शादी की बात बताई। क्या हुआ?”


“तुम्हें क्या लगता है, हर बार पैसे देकर ही हम अपने होते हैं?”


रघुवीर ने समझाने के स्वर में कहा, “तुम उनकी बातों को जानती हो। उम्र हो गई है। कभी कुछ कह देती हैं। तुम बुरा मत मानो। शादी है, कुछ खर्च करना ही पड़ेगा।”


“कितना?”


“देख लो, जो उचित हो। मैं भी कुछ भेज दूँगा।”


प्रतिमा की आवाज धीमी हो गई। “तुम गाँव जाओगे?”


“क्यों नहीं? अपना परिवार है। जाना तो पड़ेगा।”


“मैं नहीं जाना चाहती।”


रघुवीर ने कुछ क्षण बाद कहा, “तुम्हारी इच्छा। लेकिन मैं जाऊँगा। लोग क्या कहेंगे कि बेटा अपने घर के विवाह में भी नहीं आया?”


प्रतिमा के होंठ काँपे। “लोग क्या कहेंगे, यह हमेशा तुम जानते हो। मैं क्या महसूस करती हूँ, यह कभी जानने की कोशिश की?”


“यह क्या बात हुई, प्रतिमा? मैं तुम्हारे लिए ही तो इतना करता हूँ। बच्चों के लिए, घर के लिए।”


“मैंने कब कहा कि तुम कुछ नहीं करते? मैं केवल इतना पूछ रही हूँ कि जब मुझे अपमानित किया जाता है, तब तुम किसके लिए चुप रहते हो?”


रघुवीर का स्वर पहली बार कठोर हुआ। “हर बात में मुझे बीच में मत खींचो। माँ से तुम्हारा मन नहीं मिलता, तो इसका मतलब यह नहीं कि मैं अपने परिवार से नाता तोड़ दूँ।”


प्रतिमा ने फोन रख दिया।


वह जानती थी कि रघुवीर का जाना गलत नहीं था। वह यह भी जानती थी कि पति को अपने रिश्तेदारों से मिलने का अधिकार है। लेकिन उसके भीतर तर्क और भावना की लड़ाई चल रही थी। वह पति को रोकना नहीं चाहती थी, फिर भी चाहती थी कि वे स्वयं उसके मन की स्थिति समझें और इस बार उसकी पीड़ा को सामान्य बात कहकर न टालें।


रात को रघुवीर घर लौटे तो प्रतिमा ने भोजन बना रखा था। दोनों ने साथ खाना खाया। बच्चों ने अपने काम के बारे में बात की। घर में कोई झगड़ा नहीं हुआ। बाहर से सब सामान्य था।


लेकिन प्रतिमा के भीतर एक वाक्य लगातार घूम रहा था—मेरे हिस्से में हमेशा समझौता ही क्यों आता है?


शादी में जाने से एक दिन पहले रघुवीर ने कुछ पैसे निकालकर प्रतिमा को दिए।


“ये रख लो। अमित से भी बात कर लेना। कुछ अच्छा-सा उपहार ले लेना। मैं कल सुबह निकल जाऊँगा।”


प्रतिमा ने पैसे देखे। “मैंने कहा न, इस बार मैं नहीं जाना चाहती।”


“तुम मत चलो। मैं तो जा रहा हूँ।”


“और ये पैसे?”


“शादी में खर्च होंगे। घर का काम है।”


प्रतिमा ने पैसे मेज पर रख दिए।


“तुम्हें सच में लगता है कि सब ठीक है?”


रघुवीर ने झुँझलाकर कहा, “अब क्या हो गया? तुम्हें कोई कुछ कह देता है तो तुम कई दिनों तक उसी बात को पकड़े रहती हो। जीवन में कितनी समस्याएँ हैं। क्या हर बात पर घर का माहौल खराब करोगी?”


प्रतिमा ने उनकी ओर देखा। उसकी आँखों में आँसू नहीं थे।


“तुम्हारे लिए वह एक बात है। मेरे लिए वह बीस साल हैं।”


रघुवीर कुछ बोलना चाहते थे, पर शब्द नहीं मिले। उन्होंने सोचा, सुबह फिर बात करेंगे। अभी बात बढ़ाने से कोई लाभ नहीं।


प्रतिमा ने उनके कपड़े रखे, दवाइयाँ बैग में डालीं और रास्ते के लिए भोजन तैयार किया। रघुवीर ने जाते समय कहा, “अपना ध्यान रखना। पहुँचकर फोन करूँगा।”


प्रतिमा ने बस इतना कहा, “ठीक है।”


दरवाजा बंद हो गया।


घर में शांति थी। वही घर, जिसे बनाने में प्रतिमा ने अपना जीवन लगा दिया था। बच्चों की उपलब्धियाँ थीं, आर्थिक सुरक्षा थी, पति का स्नेह भी था। फिर भी उस क्षण उसे अपने जीवन की उपलब्धियों से कोई सहारा नहीं मिला।


उसने सोचा कि वह बच्चों से बात करे। फिर लगा, वे अपने काम में व्यस्त हैं। माँ से बात करे? माँ अब बूढ़ी थीं। वे शायद फिर यही कहेंगी—“बेटी, घर-गृहस्थी में ऐसा होता रहता है। निभाकर रहना।”


वह पति को फोन करना चाहती थी। लेकिन उसे डर था कि फिर वही बात होगी—समझौता करो, बुरा मत मानो, परिवार है।


उसने अपने जीवन को याद किया। बचपन में पिता की अनुपस्थिति, माँ का कठोर अनुशासन, घर के भीतर ईर्ष्या और कटुता, पिता और चाचा का मनमुटाव, विवाह के बाद ससुराल के ताने, दिल्ली के संघर्ष, बच्चों की परवरिश और फिर रिश्तों को निभाने की अंतहीन जिम्मेदारी।


उसके मन में एक कड़वा विचार आया—क्या वह केवल इसलिए प्रिय थी कि वह सबकी जरूरतें पूरी कर सकती थी?


यह विचार उसके मन में सच की तरह बैठने लगा। उसे उस समय वे रास्ते दिखाई नहीं दे रहे थे, जिनसे वह अपनी पीड़ा बाँट सकती थी। वह यह नहीं समझ पा रही थी कि आज की निराशा स्थायी नहीं है, कि पति से फिर बात की जा सकती है, कि कुछ समय के लिए रिश्तेदारों से दूरी बनाई जा सकती है, कि मानसिक संकट में सहायता लेना भी एक विकल्प है।


वह अकेली थी। और उस अकेलेपन में उसका मन अपने ही निष्कर्षों का बंदी बनता जा रहा था।


उस दिन प्रतिमा ने आत्महत्या कर ली।


रघुवीर अभी गाँव पहुँचे ही थे। बस से उतरकर वे अपने चचेरे भाई के घर जाने की तैयारी कर रहे थे। आँगन में लोग बैठे थे। शादी की चर्चा चल रही थी। किसी ने चाय पूछी, किसी ने दिल्ली का हाल। रघुवीर ने अभी बैग भी ठीक से नहीं रखा था कि उनका मोबाइल बज उठा।


फोन अमित का था।


“पापा, आप कहाँ हैं?”


“गाँव पहुँच गया हूँ। क्या हुआ?”


दूसरी ओर कुछ क्षण मौन रहा। फिर अमित की टूटी हुई आवाज आई, “पापा... माँ नहीं रहीं।”


रघुवीर को लगा, जैसे किसी ने उनके कानों में कोई असंभव बात डाल दी हो।


“क्या बोल रहे हो? क्या हुआ तुम्हारी माँ को?”


“उन्होंने... आत्महत्या कर ली।”


रघुवीर के हाथ से मोबाइल लगभग छूट गया। आसपास बैठे लोगों ने उन्हें सँभाला। वे बार-बार यही पूछते रहे, “कब? कैसे? अभी तो मैं घर से निकला था!”


कोई उत्तर देने वाला नहीं था।


जिस स्त्री ने जाते समय उनके कपड़े रखे थे, दवाइयाँ दी थीं, भोजन बाँधा था, वह अब नहीं रही। उन्हें उसकी आँखें याद आईं, उसका आखिरी वाक्य—“मेरे लिए वह बीस साल हैं।”


उस समय उन्होंने उस वाक्य को समझने की कोशिश नहीं की थी।


अब वही शब्द उनके भीतर हथौड़े की तरह पड़ रहे थे।


वे तुरंत दिल्ली लौटने के लिए निकले। रास्ते भर उनका मन उस सुबह में अटका रहा। क्या प्रतिमा ने कोई संकेत दिया था? क्या वे उसकी आवाज में छिपी बेचैनी नहीं पहचान पाए? क्या उन्होंने अपने परिवार की प्रतिष्ठा को उसकी पीड़ा से ऊपर रख दिया था?


उनके पास कोई उत्तर नहीं था। केवल एक भय था—अब वे प्रतिमा से कुछ पूछ नहीं सकेंगे।


दिल्ली पहुँचने पर घर के बाहर लोगों की भीड़ थी। पुलिस पहले से मौजूद थी। एक अधिकारी ने रघुवीर से नाम, पता और संबंध पूछा। फिर उन्हें अलग बैठाकर सवाल करने लगा।


“आपकी पत्नी से आखिरी बार कब बात हुई थी?”


“कल रात।”


“किस बात पर बातचीत हुई?”


रघुवीर ने सिर झुका लिया। “घर में शादी थी। वह गाँव नहीं आना चाहती थी। कुछ पैसों और परिवार की बात को लेकर मनमुटाव हुआ था।”


“झगड़ा हुआ था?”


“बहस हुई थी। मैंने उसे समझाया था।”


“क्या आपकी पत्नी पहले भी आत्महत्या की बात करती थीं?”


“नहीं।”


“क्या घर में मारपीट होती थी? कोई घरेलू विवाद, आर्थिक परेशानी या पारिवारिक दबाव था?”


रघुवीर के पास हर प्रश्न का उत्तर देने के लिए शब्द थे, लेकिन हर उत्तर के साथ उन्हें लगता था कि वे प्रतिमा को और अधिक असहाय बना रहे हैं।


“मैंने उसे कभी मारा नहीं, साहब। मैं उससे बहुत प्रेम करता था।”


अधिकारी ने शांत स्वर में कहा, “मैंने आपसे मारने के बारे में ही नहीं पूछा। हम यह जानना चाहते हैं कि घटना से पहले क्या हुआ था। आप जो जानते हैं, सच-सच बताइए।”


रघुवीर ने सब बताया—शादी का निमंत्रण, पैसों की चर्चा, प्रतिमा का गाँव जाने से इनकार, फोन पर हुई बहस और उनका स्वयं गाँव चले जाना।


पुलिस ने प्रतिमा का मोबाइल और कुछ अन्य सामान जाँच के लिए लिया। पड़ोसियों से पूछताछ हुई। परिवार के लोगों के बयान दर्ज किए गए। बच्चों से भी पूछा गया कि घर में कोई तनाव था या नहीं।


अमित ने कहा, “माँ ने कभी हमसे कुछ नहीं माँगा। हम दोनों अपनी नौकरी में व्यस्त रहते थे। हमें लगा कि माँ ठीक हैं।”


सुमित की आँखें लाल थीं। “हमने उन्हें सब कुछ देने की कोशिश की। कभी समझ ही नहीं पाए कि उन्हें क्या चाहिए।”


अधिकारी ने पूछा, “क्या वे हाल में उदास रहती थीं? किसी से विवाद हुआ था? उन्होंने कोई संदेश छोड़ा था?”


बच्चों ने एक-दूसरे की ओर देखा। उन्हें याद आया कि पिछले कुछ दिनों से माँ कम बोल रही थीं। फोन पर पूछने पर कह देती थीं, “सब ठीक है, तुम अपना काम देखो।”


अब उन्हें लगा कि शायद सब ठीक नहीं था।


पुलिस की जाँच चलती रही। किसी की मृत्यु के बाद केवल शोक से काम नहीं चलता; घटना की परिस्थितियों को समझना और आवश्यक कानूनी प्रक्रिया पूरी करना भी जरूरी होता है। रघुवीर को बार-बार थाने जाना पड़ा। उनसे फिर पूछताछ हुई। उन्होंने हर बार वही कहा कि उनके और प्रतिमा के बीच कोई शारीरिक हिंसा नहीं थी, लेकिन परिवार और पैसों को लेकर तनाव अवश्य था। वे जानते थे कि उनका सच केवल उनके शब्दों से प्रमाणित नहीं हो सकता। जाँच को अपने निष्कर्ष तक पहुँचना था।


उनके लिए यह सब एक दूसरी सजा जैसा था। पहली सजा प्रतिमा को खोने की थी; दूसरी, अपने हर पुराने व्यवहार को नए अर्थ में याद करने की।


अंतिम संस्कार के बाद घर खाली होने लगा। रिश्तेदार लौट गए। शोक-संदेशों का सिलसिला कम हो गया। बच्चों को काम पर लौटना था, लेकिन घर में माँ की अनुपस्थिति हर वस्तु से बोलती थी।


रघुवीर कई दिनों तक प्रतिमा की अलमारी के सामने खड़े रहते। उसकी साड़ियाँ करीने से रखी थीं। एक डिब्बे में पुराने बिल, बच्चों की फीस की रसीदें और कुछ छोटी बचत का हिसाब था। एक डायरी में उसने वर्षों के खर्च लिखे थे।


एक पन्ने पर लिखा था—


“इस महीने कुछ पैसे बच गए। अगले महीने माँ का चश्मा बनवा दूँगी।”


दूसरे पन्ने पर अमित की परीक्षा-फीस का हिसाब था। तीसरे पर सुमित की किताबों का। कहीं पति की दवा का खर्च, कहीं बिजली का बिल, कहीं गाँव भेजे गए पैसों का उल्लेख।


प्रतिमा ने हर रुपये का हिसाब रखा था। लेकिन अपने दुःख का हिसाब कहीं नहीं लिखा था।


रघुवीर देर तक डायरी देखते रहे। उन्हें लगा, प्रतिमा ने जीवन भर घर को व्यवस्थित रखा, लेकिन वे उसके भीतर की अव्यवस्था को पहचान नहीं पाए।


एक दिन उन्होंने उसके मायके फोन किया। माँ सावित्री देवी ने फोन उठाया। दोनों कुछ देर तक चुप रहे।


फिर सावित्री देवी रोते हुए बोलीं, “दामाद जी, मेरी बेटी ने ऐसा क्यों किया?”


रघुवीर के पास कोई उत्तर नहीं था। कुछ देर बाद उन्होंने कहा, “माँजी, मैं भी यही पूछ रहा हूँ।”


सावित्री देवी ने सिसकते हुए कहा, “वह बचपन से चुप थी। कभी अपनी बात नहीं कहती थी। हम समझते थे कि उसे कोई परेशानी नहीं है।”


रघुवीर ने धीरे से कहा, “माँजी, हम सब यही समझते रहे।”


फोन कट गया।


उस रात रघुवीर देर तक बैठे रहे। उन्हें पहली बार महसूस हुआ कि चुप्पी हमेशा शांति नहीं होती। कभी-कभी वह एक ऐसा कमरा होती है, जिसका दरवाजा भीतर से बंद हो चुका होता है और बाहर खड़े लोग समझते रहते हैं कि सब ठीक है।


कुछ सप्ताह बाद पुलिस की जाँच आगे बढ़ी। रघुवीर को फिर बुलाया गया। अधिकारी ने उनके बयान के कुछ बिंदुओं की पुष्टि की। उन्होंने सहयोग किया। वे चाहते थे कि घटना का सच सामने आए, लेकिन उन्हें यह भी समझ आने लगा कि कोई जाँच प्रतिमा के मन की पूरी कहानी नहीं बता सकती।


न कोई एक ताना उसकी पूरी जिंदगी समझा सकता था, न कोई एक व्यक्ति उसकी मृत्यु का संपूर्ण उत्तर बन सकता था। उसके बचपन की कटुता, भावनात्मक उपेक्षा, ससुराल के पुराने अपमान, अपनी इच्छाएँ व्यक्त न कर पाने की आदत और अंतिम दिनों की निराशा—ये सभी संभावित कड़ियाँ थीं। पर उसके अंतिम क्षणों में उसके मन में क्या चल रहा था, यह अब कोई निश्चित रूप से नहीं जान सकता था।


रघुवीर ने अपने भीतर एक और प्रश्न पाया। क्या प्रतिमा के निर्णय की कोई जिम्मेदारी स्वयं प्रतिमा पर भी थी? वह क्यों नहीं खुलकर बोली? क्यों नहीं किसी से मदद माँगी? क्यों उसने अपने सामने मौजूद विकल्पों को उस समय नहीं पहचाना?


फिर उन्हें अपनी ही बात याद आई—जब वह बोलती थी, तब क्या वे सचमुच सुनते थे?


उन्होंने यह नहीं माना कि प्रतिमा का निर्णय उचित था। उन्हें लगता था कि जीवन में कितना भी दुःख हो, मनुष्य को सहायता माँगनी चाहिए, समय लेना चाहिए, निर्णय टालना चाहिए। लेकिन अब वे यह भी समझ रहे थे कि गहरे मानसिक संकट में व्यक्ति को वही रास्ते कभी-कभी दिखाई नहीं देते, जो सामान्य अवस्था में स्पष्ट होते हैं।


प्रतिमा अपने निर्णय की जिम्मेदारी से पूरी तरह मुक्त नहीं थी; लेकिन उसकी मृत्यु को केवल उसकी कमजोरी कह देना भी सच से मुँह मोड़ना होता। वह एक मनुष्य थी—अपनी खूबियों, सीमाओं, पुराने घावों और अधूरे साहस के साथ।


रघुवीर के मन में सबसे अधिक टीस उस बात की थी कि उन्होंने उसे जीवन भर कष्ट में डालने का इरादा कभी नहीं किया था। फिर भी, अनजाने में उन्होंने कई बार उसकी पीड़ा को छोटा माना था।


प्रेम होना और प्रेम को समझना दो अलग बातें हैं—यह पाठ उन्हें बहुत देर से मिला था।


एक दिन अमित माँ की डायरी लेकर पिता के पास आया।


“पापा, इसे रख लीजिए। माँ की लिखावट है।”


रघुवीर ने डायरी खोली। एक पन्ने पर बच्चों की पढ़ाई का हिसाब था। दूसरे पर गाँव में भेजे गए पैसों का। अंतिम पन्ने पर कुछ अधूरे खर्च लिखे थे। कोई विदाई-पत्र नहीं था, कोई आरोप नहीं, कोई अंतिम संदेश नहीं।


अमित ने पूछा, “पापा, क्या माँ हमसे नाराज थीं?”


रघुवीर ने बेटे की ओर देखा। वह उत्तर देना चाहते थे कि नहीं, तुम्हारी माँ तुमसे बहुत प्रेम करती थीं। लेकिन उन्हें लगा कि यह उत्तर अधूरा होगा।


“तुम्हारी माँ हम सबसे प्रेम करती थीं,” उन्होंने कहा, “लेकिन शायद हममें से कोई भी उनके मन की सारी बातें नहीं जान पाया।”


सुमित ने धीमे स्वर में पूछा, “क्या हम कुछ कर सकते थे?”


रघुवीर की आँखें भर आईं। “शायद। लेकिन अब हम केवल इतना कर सकते हैं कि आगे किसी की चुप्पी को उसकी खुशी न समझें।”


बाहर शाम उतर रही थी। घर में प्रतिमा की तस्वीर टँगी थी। वह मुस्करा रही थी। वही मुस्कान, जिसे परिवार ने वर्षों तक उसकी प्रसन्नता का प्रमाण समझा था।


रघुवीर तस्वीर के सामने देर तक खड़े रहे। उन्हें प्रतिमा से कोई शिकायत नहीं थी कि उसने उन्हें छोड़ दिया। शिकायत थी तो इस बात की कि वह अपनी पीड़ा के उस अंतिम मोड़ पर उनसे दूर हो गई, जहाँ उन्हें उसके पास होना चाहिए था। और स्वयं से शिकायत थी कि वे उसके मौन को समझने में देर कर गए।


प्रतिमा की मृत्यु ने परिवार को एक कठोर सत्य के सामने खड़ा कर दिया था—किसी के लिए घर बनाना, उसकी आवश्यकताएँ पूरी करना और उससे प्रेम करना पर्याप्त नहीं, यदि उसके मन की बात सुनने का समय न हो।


लेकिन इस सत्य का अर्थ यह भी नहीं था कि जीवन की सारी जिम्मेदारी दूसरों पर डाल दी जाए। प्रतिमा को भी अपने दुःख के साथ सहायता माँगने का अधिकार था, और शायद आवश्यकता भी। उसके निर्णय ने उसके जीवन की सारी संभावनाएँ समाप्त कर दीं; जबकि उसके सामने सहायता, संवाद और समय के रास्ते अब भी हो सकते थे—भले ही उस क्षण उसे वे दिखाई न दिए हों।


अब घर में सब कुछ था। योग्य बच्चे, अच्छा मकान, आर्थिक सुरक्षा और रिश्तेदारों से भरा परिवार। केवल प्रतिमा नहीं थी।


रघुवीर कभी-कभी सोचते कि यदि उस दिन उन्होंने उससे इतना ही कहा होता—“तुम्हारी बात सुन रहा हूँ, बताओ क्या हुआ है”—तो क्या वह कुछ और देर उनसे बात करती? क्या वे मिलकर कोई रास्ता खोज लेते? इसका उत्तर कोई नहीं जानता।


वे प्रतिमा की मृत्यु को न किसी एक ताने का परिणाम मान सकते थे, न केवल उसकी कमजोरी। वह अनेक वर्षों की अनकही पीड़ा और एक निर्णायक संकट की त्रासदी थी, जिसका पूरा रहस्य अपने साथ चला गया।


फिर भी, उसके जीवन से एक बात स्पष्ट थी—सहनशीलता का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य को अनंत तक सहते रहना चाहिए; और आत्मसम्मान की रक्षा का अर्थ यह भी नहीं कि पीड़ा के क्षण में जीवन से ही नाता तोड़ लिया जाए।


रघुवीर ने डायरी बंद की। बाहर अँधेरा गहरा गया था।


तस्वीर में प्रतिमा अब भी मुस्करा रही थी।


और उनके मन में एक प्रश्न बार-बार उठ रहा था—


“जिस स्त्री ने जीवन भर सबका घर बचाया, वह अपने मन को बचाने के लिए किसी का हाथ क्यों नहीं थाम सकी—और हममें से किसी ने उसका हाथ समय रहते क्यों नहीं थामा?”

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