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अरमानों की धूप-छाँह

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  अरमानों की धूप-छाँह (अंग प्रदेश की माटी की गंध में रची-बसी एक स्त्री की जीवनगाथा) प्रस्तुति : डॉ धनंजय कुमार मिश्र, विभागाध्यक्ष संस्कृत, एस के एम विश्वविद्यालय दुमका, झारखंड  ------- अंग प्रदेश की धरती बड़ी विचित्र है। यहाँ की मिट्टी में गंगा का सौम्य स्पर्श है, कोसी की बेचैनी है और लोगों के स्वभाव में धैर्य की ऐसी परतें हैं, जो वर्षों के अभाव और संघर्ष से तपकर बनी हैं। यहाँ की बेटियाँ आम के बौरों की तरह चुपचाप खिलती हैं। वे अपने सपनों का शोर नहीं करतीं; उन्हें अपनी ओढ़नी के कोने में बाँधकर घर की चौखट पर रख देती हैं। वह भी ऐसी ही एक बेटी थी। गाँव के कच्चे आँगन में नंगे पाँव दौड़ती, खेतों की मेड़ों पर सरसों के फूल तोड़ती, सावन में झूला झूलती और छठ के गीतों में अपनी बाल-कल्पनाएँ पिरोती हुई बड़ी हुई थी। उसकी स्कूली शिक्षा किसी बड़े कॉन्वेंट या महानगरीय विद्यालय में नहीं हुई थी। गाँव का साधारण विद्यालय, फटी हुई किताबें, कभी-कभी बिना चप्पल के विद्यालय पहुँच जाना और परीक्षा के दिनों में लालटेन की रोशनी में पढ़ना—यही उसका संसार था। उसकी आँखों में भी सपने थे, पर अंग प्रदेश की बेटिय...