उजाला हो रहा है...
उजाला हो रहा है...
उस रात गाँव में अँधेरा कुछ अधिक घना था। आषाढ़ की उमस भरी हवा मिट्टी की दीवारों से टकराकर लौट रही थी। दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज़ आ रही थी और बीच-बीच में किसी घर की ढिबरी टिमटिमा उठती थी। पर अक्षय मिश्र के घर के भीतर जो अँधेरा पसरा था, वह रात के अँधेरे से कहीं अधिक गहरा था।
नूतन देवी खाट पर पड़ी थीं।
पूरा शरीर सूज गया था। चेहरा पहचान में आता था, पर देह जैसे अपनी ही देह न रह गई हो। साँस लेते समय उनके गले से हल्की घरघराहट निकलती थी। कभी आँखें बंद हो जातीं, कभी अचानक खुल जातीं और वह किसी अनदेखे भय से इधर-उधर देखने लगतीं।
भागलपुर के मायागंज अस्पताल से उन्हें वापस भेज दिया गया था।
"किडनी में इन्फेक्शन है," डॉक्टर ने रिपोर्ट देखते हुए कहा था, "नियमित इलाज की ज़रूरत है। दवाइयाँ चलेंगी, जाँच होगी। बीच में इलाज नहीं रुकना चाहिए।"
अक्षय ने हिचकते हुए पूछा था, "डॉक्टर साहब... कितना खर्च होगा?"
डॉक्टर कुछ क्षण चुप रहे।
"बीमारी खर्च देखकर नहीं आती," उन्होंने धीमे स्वर में कहा था, "लेकिन इलाज खर्च माँगता है।"
अक्षय की जेब में उस समय तीन सौ बीस रुपये थे।
वह डॉक्टर के कमरे से बाहर निकल आया था।
मायागंज अस्पताल के बरामदे में लोगों की भीड़ थी। कोई स्ट्रेचर खींच रहा था, कोई दवा की पर्ची लिए भाग रहा था, कोई ईश्वर का नाम जप रहा था। अक्षय भीड़ में खड़ा था, पर उसे लग रहा था जैसे वह अकेला है—इतना अकेला कि उसकी आवाज़ भी उसे सुनाई नहीं दे रही।
बस में लौटते समय नूतन ने धीरे से पूछा था—
"अक्षय..."
"हाँ।"
"घर चल रहे हैं न?"
"हाँ।"
"अस्पताल अच्छा नहीं लगता।"
अक्षय ने खिड़की से बाहर देखा। खेत पीछे भाग रहे थे। पेड़ भाग रहे थे। सड़क भाग रही थी। केवल उसका जीवन था, जो बरसों से वहीं खड़ा था।
घर पहुँचकर नूतन को खाट पर लिटा दिया गया।
मिट्टी का घर।
टूटा हुआ आँगन।
कोने में चूल्हा।
छप्पर के नीचे टँगा पुराना लालटेन।
यही उनकी दुनिया थी।
अक्षय तीन भाइयों में सबसे बड़ा था। पिता प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक थे। गाँव में सम्मान था।
लोग कहते थे—"मास्टर साहब के बेटे बहुत आगे जाएँगे।"
लेकिन नियति को शायद यह मज़ाक पसंद था।
मैट्रिक के बाद किसी भाई का मन पढ़ाई में नहीं लगा। घर की परिस्थितियाँ बिगड़ती गईं। सपनों की जगह ज़िम्मेदारियाँ आ बैठीं।
अक्षय काम की तलाश में भटका। कभी मजदूरी, कभी दुकानों पर हिसाब-किताब, कभी खेतों में हाथ बँटाना। स्थायी रोजगार कभी नहीं मिला।
धीरे-धीरे उम्र बढ़ती गई और उम्मीदें छोटी होती गईं।
आज वह बेरोज़गार था।
और उसकी पत्नी मृत्यु और जीवन के बीच झूल रही थी।
शाम को विक्की लौटा।
उसकी कमीज़ पर सीमेंट की धूल जमी हुई थी।
उसने जेब से मुड़े-तुड़े नोट निकालकर पिता के सामने रख दिए।
"पाँच सौ रुपये मिले हैं आज।"
अक्षय ने नोटों को देखा।
"अपने पास रख ले बेटा। तेरे भी बच्चे हैं।"
विक्की की आँखें लाल हो उठीं।
"और माँ?"
"मैं देख लूँगा।"
"कैसे देख लोगे?" उसकी आवाज़ भर्रा गई, "दिनभर मजदूरी करता हूँ। बच्चों का दूध, राशन, किराया... और अब माँ की दवा। आदमी आखिर कितनी दिशाओं में टूटे?"
भीतर से उसकी पत्नी की आवाज़ आई—
"हमारे बच्चे भी भूखे रहते हैं। क्या करें हम?"
विक्की ज़मीन पर बैठ गया।
"बाबूजी," उसने सिर झुकाकर पूछा, "गरीब आदमी पैदा ही क्यों होता है?"
अक्षय बहुत देर तक चुप रहा।
फिर बोला—
"शायद अमीरों को यह याद दिलाने के लिए कि इंसानियत अभी मरी नहीं है।"
विक्की हँसा।
पर वह हँसी नहीं थी।
थकान की दरार थी।
उसी घर में एक और अनुपस्थिति थी—नन्हें।
कोविड के दिनों में वह बाहर कमाने गया था।
पहले फोन आते थे।
फिर कम आने लगे।
फिर एक दिन बंद हो गए।
कोई नहीं जानता था वह कहाँ है।
जिंदा है या नहीं।
नूतन कभी-कभी उनींदी आँखों से पूछतीं—
"नन्हें आया?"
अक्षय कहता—
"आ जाएगा।"
"उसे कहना... माँ इंतज़ार कर रही है।"
दिल्ली से बेटी भावना आई थी।
माँ को देखने।
उसने माँ के सूजे हुए पैर दबाए।
"माँ, दर्द बहुत है?"
नूतन मुस्करा दीं।
"दर्द भी अब अपना लगता है बिटिया।"
भावना रो पड़ी।
"माँ, तुम ठीक हो जाओगी।"
"तू आ गई न, अब ठीक हूँ।"
"मैं तुम्हें दिल्ली ले चलूँ?"
नूतन ने सिर हिलाया।
"बेटियाँ माँ को कहाँ ले जाती हैं?"
भावना ने माँ का हाथ पकड़ लिया।
"माँ, बेटियाँ पराई होती होंगी, लेकिन माँ कभी पराई नहीं होती।"
नूतन की आँखों के कोने भीग गए।
"भगवान तुझे सुख दे।"
गाँव के लोग आते रहे।
कोई पूछता—"क्या कहा डॉक्टर ने?"
कोई सलाह देता—"पटना ले जाइए।"
कोई कहता—"सरकार से मदद माँगिए।"
कोई दो सौ रुपये रख जाता।
कोई चावल।
कोई दाल।
एक बूढ़े पड़ोसी ने आह भरकर कहा—
"गरीब की बीमारी बीमारी नहीं होती, बेटा। वह परीक्षा होती है—जिसमें मरीज से ज्यादा परिवार मरता है।"
आँगन में सन्नाटा उतर आया।
उस रात भावना ने पिता को पहली बार टूटते देखा।
"बाबूजी..."
"हाँ बिटिया?"
"आप थक गए हैं न?"
अक्षय मुस्करा दिया।
"बहुत पहले।"
"कभी अपने लिए कुछ माँगा था?"
"हाँ।"
"क्या?"
"एक नौकरी।"
"मिली?"
"नहीं।"
"भगवान से शिकायत नहीं हुई?"
अक्षय ने आकाश की ओर देखा।
"बहुत हुई। फिर लगा, शायद भगवान भी अब सिफारिश से काम करते होंगे।"
भावना का गला भर आया।
"ऐसा मत कहिए बाबूजी।"
"क्यों न कहूँ?" पहली बार उसके स्वर में क्षोभ था, "मैंने किसी का हक नहीं छीना। मेहनत की। इंतज़ार किया। लेकिन जब आदमी की जेब खाली होती है न बिटिया, तब उसका सच भी हल्का हो जाता है।"
फिर वह शांत हो गया।
"लेकिन सुन... कटुता आदमी को भीतर से खा जाती है। इसलिए अब शिकायत भी धीरे-धीरे छोड़ दी है।"
आधी रात बीत गई।
लालटेन की लौ छोटी पड़ने लगी।
नूतन ने धीमे से पुकारा—
"अक्षय..."
"हाँ।"
"यदि मैं..."
"चुप।"
"सुनो तो..."
"तुम्हें कुछ नहीं होगा।"
नूतन ने फीकी मुस्कान के साथ कहा—
"यदि हो जाए... तो बेटी को बोझ मत समझना।"
अक्षय का चेहरा काँप उठा।
"पागल हो गई हो क्या? अभी तो तुम्हें सावन का झूला झूलना है।"
"और?"
"और मेले से तुम्हारे लिए लाल चूड़ियाँ लानी हैं।"
"इस उम्र में?"
"तो क्या हुआ? तुम बूढ़ी कब हुई?"
नूतन हल्के से हँसीं।
"झूठे..."
दोनों की आँखें भीग गईं।
सालों का दाम्पत्य उस क्षण किसी वचन की तरह उनके बीच बैठा था।
प्रेम शायद यही है—जब आदमी के पास देने को कुछ न बचे, तब भी वह आश्वासन देता रहे।
रात और गहरी हो गई।
दूर कहीं मंदिर की घंटी बजी।
किसी पेड़ पर बैठा पंछी अचानक फड़फड़ाकर उड़ गया।
अक्षय आँगन में बैठा रहा।
उसे अपने पिता याद आए।
प्राथमिक शिक्षक।
साफ धोती।
कंधे पर झोला।
और वह वाक्य—
"बेटा, पढ़ाई आदमी की सबसे बड़ी पूँजी होती है।"
अक्षय की आँखें भर आईं।
उसने मन-ही-मन सोचा—
कितनी विचित्र व्यवस्था है। एक बीमारी पीढ़ियों की कमाई निगल जाती है। एक बेरोज़गारी आदमी का आत्मविश्वास छीन लेती है। और एक गरीब परिवार जीवन भर सम्मान बचाने की लड़ाई लड़ता रहता है।
भोर से पहले नूतन ने फिर आँखें खोलीं।
"अक्षय..."
"हाँ?"
"उजाला हो गया क्या?"
अक्षय ने बाहर देखा।
पूर्व दिशा अब भी अँधेरी थी।
सूरज निकलने में देर थी।
उसने नूतन का ठंडा पड़ता हाथ अपने दोनों हाथों में लिया।
उसकी आँखें छलक उठीं।
लेकिन स्वर में उसने पूरी दुनिया की कोमलता भर दी।
"हाँ नूतन..."
उसने धीरे से कहा—
"उजाला हो रहा है..."
नूतन ने आँखें बंद कर लीं।
शायद वह उस उजाले की कल्पना कर रही थीं जहाँ अस्पताल से कोई गरीब लौटाया न जाए, जहाँ माँ के इलाज और बच्चों की रोटी में चुनाव न करना पड़े, जहाँ बेटियाँ पराई न कहलाएँ, जहाँ मजदूर बेटा अपनी माँ की दवा खरीदते समय अपराधबोध से न भरे, जहाँ बेरोज़गार पति अपनी पत्नी के सामने असहाय खड़ा न रहे।
अक्षय उनका हाथ थामे बैठा रहा।
बाहर सचमुच उजाला होने लगा था।
मुर्गे बाँग दे रहे थे।
आकाश का रंग बदल रहा था।
और उस छोटे से घर में, जहाँ गरीबी ने वर्षों से डेरा डाल रखा था, मनुष्यता अब भी अंतिम साँस तक अपना दीप जलाए हुए थी।
क्योंकि इस संसार में सबसे भयानक अँधेरा गरीबी नहीं है।
सबसे भयानक अँधेरा वह है, जब मनुष्य दूसरे मनुष्य के दुःख के प्रति संवेदनहीन हो जाए।
और सबसे बड़ा उजाला यह है कि टूट जाने पर भी कोई बेटी माँ के पास लौट आती है, कोई मजदूर बेटा अपनी दिनभर की कमाई खाट के सिरहाने रख देता है, कोई पड़ोसी मुट्ठी भर चावल छोड़ जाता है, और कोई पति अपनी मरती हुई उम्मीद से कहता है—
"हाँ नूतन... उजाला हो रहा है..."

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