स्वार्थ

 

         प्रस्तुति : डॉ धनंजय कुमार मिश्र 

मिहिजाम एक अजीब कस्बा था।

न पूरी तरह शहर, न पूरा गांव।

सुबह मंदिरों की घंटियों से खुलती, दोपहर में चित्तरंजन की फैक्ट्री संस्कृति का असर दिखता और शाम होते-होते जामताड़ा के गांवों की चौपालों जैसी गपशप गलियों में उतर आती। यहां लोग आधुनिक भी थे और परंपरावादी भी। सामने मुस्कुराकर नमस्कार करते और पीठ पीछे किसी के जीवन का पूरा इतिहास खोलकर रख देते।

इसी कस्बे के एक निजी महाविद्यालय में राजेश्वरी पढ़ाती थी।

चालीस वर्ष की उम्र में भी उसका व्यक्तित्व आकर्षक था। गोरा रंग नहीं, लेकिन आंखों में एक ऐसी चमक थी जो लोगों को सहज ही अपनी ओर खींच लेती।

घर में वह आदर्श बहू थी।

करवा चौथ से लेकर छठ तक, सत्यनारायण कथा से लेकर दुर्गा पूजा तक, हर अनुष्ठान में सबसे आगे।

पति नीरज की किराना और स्टेशनरी की छोटी-सी दुकान थी। आय सीमित थी, लेकिन परिवार संतुष्ट था। पंद्रह वर्ष का बेटा आर्यन और दस वर्ष की बेटी गौरी उसके संसार के केंद्र थे।

लेकिन मनुष्य का संसार केवल घर नहीं होता।

एक दूसरा संसार भी होता है—मन का संसार।

और वही संसार कभी-कभी सबसे बड़ा युद्धक्षेत्र बन जाता है।

विश्वविद्यालय के काम से उसका आना-जाना बढ़ा था।

कभी परीक्षा, कभी बैठक, कभी शोध-संबंधी औपचारिकताएं।

वहीं उसकी मुलाकात हुई अधिकारी अरविंद से।

अरविंद पचास के आसपास थे।

पढ़े-लिखे, प्रभावशाली, आत्मविश्वासी।

लोग उनके सामने झुकते थे।

राजेश्वरी ने पहली बार उन्हें एक बैठक में देखा था।

"आपकी बातों में स्पष्टता है," बैठक समाप्त होने पर अरविंद ने कहा था।

बस इतना ही।

लेकिन कई संबंध एक वाक्य से शुरू होते हैं।

और फिर धीरे-धीरे पूरे जीवन में फैल जाते हैं।

फोन नंबरों का आदान-प्रदान हुआ।

फिर संदेश।

फिर लंबी बातचीत।

राजेश्वरी को आश्चर्य होता था कि वह अपने पति से जितनी बातें महीनों में नहीं करती, उतनी बातें अरविंद से एक शाम में कर लेती थी।

एक दिन अरविंद ने पूछा—

"तुम खुश हो?"

राजेश्वरी चौंक गई।

"क्यों?"

"क्योंकि खुश लोग रात के ग्यारह बजे किसी अनजान आदमी से इतनी देर बात नहीं करते।"

फोन के उस पार लंबी चुप्पी थी।

उस दिन पहली बार राजेश्वरी रोई थी।

बिना कारण।

या शायद बहुत सारे कारणों से।

संबंध धीरे-धीरे प्रेम में बदल गया।

या दोनों उसे प्रेम समझ बैठे।

मुलाकातें होने लगीं।

विश्वविद्यालय के बहाने।

सेमिनारों के बहाने।

फिर एक दिन वह सीमा भी टूट गई जिसे दोनों वर्षों तक बचाए रखना चाहते थे।

दैहिक संबंध स्थापित हो गया।

उस दिन लौटते समय राजेश्वरी पूरी यात्रा में खिड़की से बाहर देखती रही।

अरविंद ने पूछा—

"पछता रही हो?"

"पता नहीं।"

"मैं तुमसे प्रेम करता हूं।"

राजेश्वरी मुस्कुराई।

"प्रेम और इच्छा में अंतर होता है अरविंद जी।"

"तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं?"

"मुझे स्वयं पर भरोसा नहीं।"

समय बहता गया।

एक वर्ष।

दो वर्ष।

तीन वर्ष।

चार वर्ष।

घर चलता रहा।

बच्चे बड़े होते रहे।

पति दुकान में व्यस्त रहे।

और राजेश्वरी दो जीवन जीती रही।

एक सामाजिक।

एक गुप्त।

सब कुछ सामान्य था।

कम-से-कम ऊपर से।

फिर एक दिन आहट हुई।

विश्वविद्यालय के एक कर्मचारी ने दोनों को साथ देखा।

देखने में कुछ असामान्य नहीं था।

लेकिन उसकी मुस्कान असामान्य थी।

वह मुस्कान जो रहस्य पकड़ लेने के बाद लोगों के चेहरे पर आ जाती है।

उस रात राजेश्वरी सो नहीं सकी।

उसे पहली बार अपने बेटे का चेहरा याद आया।

बेटी का मासूम विश्वास याद आया।

पति की थकी हुई आंखें याद आईं।

वह सोचती रही—

यदि कल सबको पता चल गया तो?

यदि बच्चों को पता चल गया तो?

यदि घर टूट गया तो?

अगले दिन उसने अरविंद को बुलाया।

एक सुनसान रेस्तरां के कोने में दोनों बैठे थे।

पहली बार दोनों के बीच मौन बैठा था।

अरविंद बोले—

"घबराओ मत। कुछ नहीं होगा।"

"आपको कैसे मालूम?"

"मैं संभाल लूंगा।"

"क्या संभाल लेंगे?"

"सब कुछ।"

राजेश्वरी हंस पड़ी।

लेकिन वह हंसी व्यंग्य से भरी थी।

"सब कुछ?"

"हां।"

"यदि बात खुल गई तो क्या आप अपनी पत्नी को छोड़ देंगे?"

अरविंद चुप रहे।

"क्या आप समाज के सामने स्वीकार करेंगे कि मैं आपकी प्रेमिका हूं?"

मौन।

"क्या आप मेरे बच्चों का हाथ पकड़कर कहेंगे कि उनकी मां गलत नहीं थी?"

अरविंद ने नजरें झुका लीं।

राजेश्वरी का स्वर कठोर हो गया।

"बोलिए।"

"स्थिति इतनी सरल नहीं है।"

"यही सुनना था मुझे।"

कुछ देर बाद वह धीरे से बोली—

"जानते हैं, पुरुष और स्त्री प्रेम को अलग-अलग तरह से जीते हैं।"

"मतलब?"

"स्त्री सब कुछ दांव पर लगा देती है। पुरुष गणित लगाता है।"

"यह अन्याय है।"

"नहीं। सत्य है।"

"मैंने तुमसे प्रेम किया है।"

"किया है। लेकिन अपनी सुविधाओं की सीमा तक।"

अरविंद के चेहरे पर पीड़ा उभरी।

"तुम मुझे स्वार्थी कह रही हो?"

राजेश्वरी ने उनकी आंखों में देखते हुए कहा—

"हां।"

"चार वर्षों के बाद?"

"चार वर्षों के बाद ही।"

"क्यों?"

"क्योंकि आज पहली बार मैंने देखा कि मेरे पास खोने के लिए सब कुछ है और आपके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं।"

उसके बाद वह उठ खड़ी हुई।

"राजेश्वरी!"

"जी?"

"मत जाओ।"

"जाना पड़ेगा।"

"मैं तुम्हारे बिना नहीं रह पाऊंगा।"

राजेश्वरी की आंखें भर आईं।

"मैं भी नहीं रह पाऊंगी।"

"फिर?"

"कुछ प्रेम साथ रहने के लिए नहीं होते।"

"तो किसलिए होते हैं?"

"जीवन भर पछताने के लिए।"

उस दिन के बाद उसने फोन उठाना बंद कर दिया।

संदेशों का उत्तर देना बंद कर दिया।

विश्वविद्यालय जाना कम कर दिया।

धीरे-धीरे संपर्क समाप्त हो गया।

दो वर्ष बाद।

एक सर्द सुबह।

राजेश्वरी कॉलेज जाने की तैयारी कर रही थी कि मोबाइल पर एक संदेश आया।

अरविंद के एक परिचित का था।

"सर नहीं रहे। हार्ट अटैक।"

मोबाइल उसके हाथ से छूट गया।

दुनिया जैसे अचानक रुक गई।

उस रात वह छत पर अकेली बैठी थी।

नीचे आंगन में पति बच्चों के साथ हंस रहे थे।

बेटी कुछ सुना रही थी।

बेटा ठहाके लगा रहा था।

सामने पूर्णिमा का चांद था।

और भीतर एक अंधेरा।

बहुत गहरा अंधेरा।

उसने धीरे से आकाश की ओर देखा।

आंखों से आंसू बह निकले।

"आप सचमुच स्वार्थी थे अरविंद जी..."

वह बुदबुदाई।

"सारा अपराध मुझे देकर चले गए।"

हवा में कोई उत्तर नहीं था।

केवल सन्नाटा था।

और उस सन्नाटे में राजेश्वरी को पहली बार समझ आया कि कुछ संबंध समाप्त नहीं होते।

वे मरते भी नहीं।

वे केवल स्मृति बनकर मन के किसी अंधेरे कोने में बैठ जाते हैं—

जहां से जीवन भर आवाज आती रहती है।

और हर आवाज में एक ही शब्द गूंजता है—

"स्वार्थ..."।

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