अरमानों की धूप-छाँह
अरमानों की धूप-छाँह
(अंग प्रदेश की माटी की गंध में रची-बसी एक स्त्री की जीवनगाथा)
प्रस्तुति : डॉ धनंजय कुमार मिश्र, विभागाध्यक्ष संस्कृत, एस के एम विश्वविद्यालय दुमका, झारखंड
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अंग प्रदेश की धरती बड़ी विचित्र है। यहाँ की मिट्टी में गंगा का सौम्य स्पर्श है, कोसी की बेचैनी है और लोगों के स्वभाव में धैर्य की ऐसी परतें हैं, जो वर्षों के अभाव और संघर्ष से तपकर बनी हैं। यहाँ की बेटियाँ आम के बौरों की तरह चुपचाप खिलती हैं। वे अपने सपनों का शोर नहीं करतीं; उन्हें अपनी ओढ़नी के कोने में बाँधकर घर की चौखट पर रख देती हैं।
वह भी ऐसी ही एक बेटी थी।
गाँव के कच्चे आँगन में नंगे पाँव दौड़ती, खेतों की मेड़ों पर सरसों के फूल तोड़ती, सावन में झूला झूलती और छठ के गीतों में अपनी बाल-कल्पनाएँ पिरोती हुई बड़ी हुई थी। उसकी स्कूली शिक्षा किसी बड़े कॉन्वेंट या महानगरीय विद्यालय में नहीं हुई थी। गाँव का साधारण विद्यालय, फटी हुई किताबें, कभी-कभी बिना चप्पल के विद्यालय पहुँच जाना और परीक्षा के दिनों में लालटेन की रोशनी में पढ़ना—यही उसका संसार था।
उसकी आँखों में भी सपने थे, पर अंग प्रदेश की बेटियाँ सपनों को बहुत ऊँची आवाज़ में नहीं बोलतीं। वे जानती हैं कि उनके जीवन की दिशा प्रायः उनके अपने हाथों में नहीं होती।
मात्र बीस-बाइस वर्ष की आयु में उसका विवाह हो गया।
भारतीय समाज में विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, दो संस्कारों, दो कुलों और दो अपेक्षाओं का मिलन होता है। किन्तु यह मिलन हमेशा मधुर हो, ऐसा कहाँ होता है? दाम्पत्य जीवन के प्रारम्भिक वर्षों में उसे भी वैवाहिक उथल-पुथल के थपेड़ों से गुजरना पड़ा। मन के भीतर अनेक प्रश्न उठे—क्या यही जीवन है? क्या स्त्री का अस्तित्व केवल समर्पण का दूसरा नाम है? क्या उसके अपने सपनों का कोई मूल्य नहीं?
मनोविज्ञान कहता है कि निरन्तर तनाव मनुष्य के भीतर या तो विद्रोह उत्पन्न करता है अथवा आत्मसमर्पण। किन्तु कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जो तीसरा मार्ग चुनते हैं—रचनात्मक धैर्य का मार्ग।
उसने यही मार्ग चुना।
धीरे-धीरे वह दो बच्चों की माँ बनी। बच्चों की किलकारियों ने उसके भीतर के टूटे हुए हिस्सों को जोड़ना शुरू किया। मातृत्व मनुष्य के व्यक्तित्व को बदल देता है। जो स्त्री कल तक अपने लिए रोती थी, वह आज बच्चों की मुस्कान के लिए अपने आँसू पीना सीख जाती है।
भारतीय दर्शन में माँ को प्रथम गुरु कहा गया है। वह अपने बच्चों के लिए गुरु बनी, पर भीतर कहीं एक छात्रा अभी जीवित थी। वह छात्रा अवसर की प्रतीक्षा कर रही थी।
समय ने करवट ली।
पति का सानिध्य मिला, परिस्थितियाँ कुछ अनुकूल हुईं और उसने पुनः पुस्तकों की ओर लौटने का साहस किया। यह लौटना सरल नहीं था। वर्षों बाद किताबें खोलना, गृहस्थी की जिम्मेदारियों के बीच अध्ययन करना, बच्चों के सो जाने के बाद रात के अंतिम प्रहर में पढ़ना—यह किसी तपस्या से कम न था।
उसने स्नातकोत्तर किया।
फिर शोध की कठिन यात्रा में प्रवेश किया। पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की।
इसके बाद बी.एड. भी किया।
उसके जीवन का प्रत्येक प्रमाणपत्र केवल शैक्षणिक उपलब्धि नहीं था; वह उसके धैर्य, आत्मविश्वास और पुनर्जन्म का दस्तावेज़ था।
प्रेमचंद होते तो शायद लिखते कि यह स्त्री अपने समय की धनिया से भिन्न होते हुए भी उसी परम्परा की उत्तराधिकारी थी। धनिया ने परिवार को टूटने नहीं दिया था, और इस स्त्री ने अपने टूटे हुए स्वप्नों को पुनः जोड़कर उन्हें शिक्षा के दीप में बदल दिया।
अन्ततः उसे उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में शिक्षिका के रूप में नियुक्ति मिली।
जिस दिन नियुक्ति-पत्र हाथ में आया होगा, उस दिन उसके भीतर की वह छोटी-सी ग्रामीण लड़की अवश्य मुस्कराई होगी, जो कभी लालटेन की रोशनी में पढ़ती थी। उसे लगा होगा कि संघर्ष का प्रतिफल मिल गया। अब वह अपने पिता की आँखों में गर्व देखेगी। वह उन्हें बताएगी कि उनकी बेटी हार नहीं मानी।
किन्तु जीवन की सबसे बड़ी विडम्बना यही है कि वह मनुष्य को सम्पूर्ण सुख बहुत कम देता है।
नौकरी मिलने के कुछ समय बाद ही उसके पिता का निधन हो गया।
जिस पिता ने कभी उँगली पकड़कर विद्यालय पहुँचाया था, जिसने अभावों के बीच भी बेटी के भीतर शिक्षा का संस्कार रोपा था, वही पिता उसकी सफलता का पूर्ण उत्सव देखे बिना चले गए।
उस दिन उसने जाना कि उपलब्धियों की भी अपनी उदासी होती है।
भारतीय आध्यात्मिक परम्परा कहती है—"अनित्यं असुखं लोकम्।" यह संसार अनित्य है। यहाँ कोई भी सुख पूर्ण नहीं होता। हर प्राप्ति के साथ कोई न कोई रिक्तता जुड़ी रहती है।
पिता के जाने के बाद जब लोग उसे बधाई देते, तब उसके होंठ मुस्करा देते थे, पर भीतर कहीं एक बच्ची फूट-फूटकर रोती थी—"बाबूजी! देखिए न, आपकी बेटी मास्टरनी बन गई..."
किन्तु उत्तर में केवल स्मृतियों की निस्तब्धता मिलती।
फिर भी जीवन रुका नहीं।
वह विद्यालय जाती रही। बच्चों को पढ़ाती रही। अपने विद्यार्थियों में वह अपने पिता का स्वप्न खोजती रही। किसी निर्धन छात्रा की आँखों में उसे अपना अतीत दिखाई देता। वह उसे अतिरिक्त समय देती, प्रोत्साहित करती, क्योंकि वह जानती थी कि ग्रामीण परिवेश की बेटियों के लिए शिक्षा केवल डिग्री नहीं, आत्मसम्मान का मार्ग होती है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो उसने अपने निजी दुःख का सब्लिमेशन किया—अर्थात् पीड़ा को सृजन में बदल दिया। उसने अपने अभाव को दूसरों के जीवन का आलोक बना दिया।
आध्यात्मिक दृष्टि से उसका जीवन गीता के निष्काम कर्मयोग का उदाहरण बन गया। उसने कर्म किया, परिणाम की प्रतीक्षा की, हानि-सुख दोनों को स्वीकार किया और फिर भी अपने कर्तव्य से विमुख नहीं हुई।
भारतीय परम्परा में स्त्री को शक्ति कहा गया है। यह शक्ति केवल दुर्गा के अस्त्रों में नहीं, बल्कि उस साधारण स्त्री के धैर्य में भी प्रकट होती है, जो टूटकर भी परिवार को संभालती है, रोकर भी मुस्कराती है और अपने अधूरे सपनों के बीच अगली पीढ़ी के लिए रास्ते बनाती है।
आज भी जब अंग प्रदेश में पुरवैया चलती है, आम के बगीचों से मंजरी की सुगंध आती है, छठ के गीत गूँजते हैं और गाँव की पगडंडियों पर स्कूली बच्चियाँ बस्ता टाँगे चलती हैं, तब लगता है कि उनमें से किसी की कहानी फिर ऐसी ही होगी।
क्योंकि इस देश की असंख्य स्त्रियाँ इतिहास की पुस्तकों में दर्ज नहीं होतीं, किन्तु वे ही समाज का मौन इतिहास लिखती हैं।
उनके अनेक अरमान सच हो जाते हैं, अनेक अधूरे रह जाते हैं; पर वे जीवन से हारना नहीं सीखतीं।
और शायद यही उनकी सबसे बड़ी विजय है।
उनकी कहानी पुरस्कारों से नहीं, उनके धैर्य से मापी जाती है।
वे साधारण दिखती हैं, किन्तु असाधारण होती हैं।
वे बेटियाँ होती हैं, पत्नियाँ होती हैं, माताएँ होती हैं, शिक्षिकाएँ होती हैं—
और अंततः, वे स्वयं अपने संघर्ष की अमर कथा बन जाती हैं।

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