चौराहे पर बिखरा हुआ प्रेम
शहर का वह चौराहा बड़ा बदनाम था। दिन में वहाँ इतनी भीड़ रहती कि आदमी आदमी को पहचान न सके और रात में इतनी खामोशी उतर आती कि किसी अकेले आदमी की आह भी दूर तक सुनाई दे। चारों ओर दुकानें थीं, ठेले थे, रिक्शे थे, बसों की आवाजाही थी और बीच में ट्रैफिक का वह गोल चक्कर, जहाँ हर दिशा से आती हुई जिंदगी कुछ क्षणों के लिए रुकती और फिर अपनी-अपनी राह पकड़ लेती। उस दिन भी चौराहा व्यस्त था। लेकिन दोपहर के उस शोर में अचानक एक ऐसी आवाज उठी, जिसने लोगों के कदम रोक दिए। एक युवती सड़क के किनारे पड़ी थी। उसकी गोद में डेढ़ साल का बच्चा था। बच्चा रोते-रोते हिचकियाँ ले रहा था। युवती के बाल बिखरे हुए थे, कपड़े धूल से सने थे और आँखें ऐसी थीं जैसे कई रातों से नींद ने उससे नाता तोड़ लिया हो। वह किसी को पहचान नहीं रही थी। बार-बार एक ही बात कहती— “मुझे घर जाना है... मुझे घर ले चलो... बाबूजी से कह दो... मैं आ गई हूँ...” भीड़ में से किसी ने पूछा— “कहाँ है तुम्हारा घर?” युवती ने सामने देखा। बहुत देर तक देखती रही। फिर जैसे किसी दूर के दृश्य को याद करने की कोशिश करते हुए बोली— “घर...?” और अचानक हँसने लगी। वह हँसी हँस...