उजाला हो रहा है...
उजाला हो रहा है... प्रस्तुति : डॉ धनंजय कुमार मिश्र उस रात गाँव में अँधेरा कुछ अधिक घना था। आषाढ़ की उमस भरी हवा मिट्टी की दीवारों से टकराकर लौट रही थी। दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज़ आ रही थी और बीच-बीच में किसी घर की ढिबरी टिमटिमा उठती थी। पर अक्षय मिश्र के घर के भीतर जो अँधेरा पसरा था, वह रात के अँधेरे से कहीं अधिक गहरा था। नूतन देवी खाट पर पड़ी थीं। पूरा शरीर सूज गया था। चेहरा पहचान में आता था, पर देह जैसे अपनी ही देह न रह गई हो। साँस लेते समय उनके गले से हल्की घरघराहट निकलती थी। कभी आँखें बंद हो जातीं, कभी अचानक खुल जातीं और वह किसी अनदेखे भय से इधर-उधर देखने लगतीं। भागलपुर के मायागंज अस्पताल से उन्हें वापस भेज दिया गया था। "किडनी में इन्फेक्शन है," डॉक्टर ने रिपोर्ट देखते हुए कहा था, "नियमित इलाज की ज़रूरत है। दवाइयाँ चलेंगी, जाँच होगी। बीच में इलाज नहीं रुकना चाहिए।" अक्षय ने हिचकते हुए पूछा था, "डॉक्टर साहब... कितना खर्च होगा?" डॉक्टर कुछ क्षण चुप रहे। "बीमारी खर्च देखकर नहीं आती," उन्होंने धीमे स्व...