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संध्या ( एक घटना-प्रधान कहानी)

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  संध्या ( एक घटना-प्रधान कहानी)                प्रस्तुति - डॉ धनंजय कुमार मिश्र  पटना की साँझ का अपना एक स्वभाव है। गंगा के जल पर जब अस्ताचलगामी सूर्य अपनी रक्ताभ आभा बिखेरता है, तब लगता है मानो दिन ने अपने समस्त अपराधों की क्षमा माँगते हुए आकाश के चरणों में केसर घोल दी हो। अशोक राजपथ की भागती हुई भीड़, बोरिंग रोड की जगमगाती दुकानें, कंकड़बाग की खिड़कियों से छनती ट्यूबलाइट की उजास और गर्दनीबाग की गलियों में तुलसी चौरे के सम्मुख टिमटिमाते दीप—सब मिलकर एक विचित्र द्वंद्व रचते थे। एक ओर आधुनिकता की अधीर साँसें थीं, दूसरी ओर परम्परा की दीर्घ निःश्वास। उसी द्वंद्व का नाम थी—संध्या। वह अपने पिता रामलाल की सबसे बड़ी बेटी थी। उसके नेत्रों में गंगा की गहराई थी और मुख पर किसी मौन तपस्विनी की शान्त छाया। वह जब बोलती, तो लगता जैसे किसी पुराने वीणा-तार पर नई धुन उतर आई हो। उस दिन कोचिंग से लौटते समय अभय ने पूछा— "संध्या, क्या प्रेम भी नौकरी की तरह नियुक्ति-पत्र चाहता है?" संध्या मुस्कराई। मुस्कान में विषाद की हल्की रेखा थी। "नहीं," उसने कहा, "प्रेम ...

अरमानों की धूप-छाँह

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  अरमानों की धूप-छाँह (अंग प्रदेश की माटी की गंध में रची-बसी एक स्त्री की जीवनगाथा) प्रस्तुति : डॉ धनंजय कुमार मिश्र, विभागाध्यक्ष संस्कृत, एस के एम विश्वविद्यालय दुमका, झारखंड  ------- अंग प्रदेश की धरती बड़ी विचित्र है। यहाँ की मिट्टी में गंगा का सौम्य स्पर्श है, कोसी की बेचैनी है और लोगों के स्वभाव में धैर्य की ऐसी परतें हैं, जो वर्षों के अभाव और संघर्ष से तपकर बनी हैं। यहाँ की बेटियाँ आम के बौरों की तरह चुपचाप खिलती हैं। वे अपने सपनों का शोर नहीं करतीं; उन्हें अपनी ओढ़नी के कोने में बाँधकर घर की चौखट पर रख देती हैं। वह भी ऐसी ही एक बेटी थी। गाँव के कच्चे आँगन में नंगे पाँव दौड़ती, खेतों की मेड़ों पर सरसों के फूल तोड़ती, सावन में झूला झूलती और छठ के गीतों में अपनी बाल-कल्पनाएँ पिरोती हुई बड़ी हुई थी। उसकी स्कूली शिक्षा किसी बड़े कॉन्वेंट या महानगरीय विद्यालय में नहीं हुई थी। गाँव का साधारण विद्यालय, फटी हुई किताबें, कभी-कभी बिना चप्पल के विद्यालय पहुँच जाना और परीक्षा के दिनों में लालटेन की रोशनी में पढ़ना—यही उसका संसार था। उसकी आँखों में भी सपने थे, पर अंग प्रदेश की बेटिय...

रामनवमी: उत्सव नहीं, मानवता की परीक्षा

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 *रामनवमी: उत्सव नहीं, मानवता की परीक्षा* डॉ धनंजय कुमार मिश्र विभागाध्यक्ष संस्कृत एस के एम विश्वविद्यालय दुमका  ----- वसन्त की मृदुल छाया में, जब प्रकृति नवजीवन का स्वप्न बुनती है, तब भारतीय मानस में एक अनुगूँज उठती है—राम। यह केवल एक नाम नहीं, यह मर्यादा का वह दीप है, जो युगों से मनुष्य के पथ को आलोकित करता आया है। रामनवमी का यह पर्व हमें बाह्य उल्लास से अधिक भीतर की कसौटी पर कसता है—कि क्या हम वास्तव में उस मर्यादा को जी पा रहे हैं, जिसका आदर्श श्रीराम ने स्थापित किया? “सियाराममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥”  यह दृष्टि केवल भक्ति नहीं, एक सांस्कृतिक चेतना है—जहाँ समस्त सृष्टि में एकात्म भाव दिखाई देता है। राम का जीवन समाज के विविध वर्गों के बीच सेतु निर्माण का उदाहरण है। निषादराज, शबरी, सुग्रीव—इन सभी के साथ उनका व्यवहार यह सिद्ध करता है कि सामाजिक मर्यादा केवल पद या प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि संवेदना और समानता से निर्मित होती है। आज जब समाज विभाजनों की रेखाओं में उलझता जा रहा है, राम का आचरण हमें स्मरण कराता है कि मर्यादा का अर्थ है—सबको साथ लेकर चलना, बिना ...

भारतीय अभिवादन नमस्ते, नमस्कार और प्रणाम

भारतीय संस्कृति में अभिवादन मात्र औपचारिकता नहीं, बल्कि आत्मीयता, सम्मान और आध्यात्मिक भावभूमि का प्रतीक है। जब कोई भारतीय किसी से मिलता है, तो उसके मुख से सहज ही निकलते हैं – नमस्ते, नमस्कार अथवा प्रणाम। ये तीनों शब्द देखने में समान लगते हैं, परन्तु इनके भीतर निहित भाव और प्रयोग की गरिमा भिन्न-भिन्न है। संस्कृत अव्यय नमः से उत्पन्न नमस्ते का अर्थ है – मैं आपको नमस्कार करता हूँ, आपके भीतर स्थित ईश्वर को प्रणाम करता हूँ। यह केवल व्यक्ति को नहीं, उसके भीतर विद्यमान दिव्यता को भी प्रणति है। इसलिए किसी भी समय, किसी भी स्थान, किसी भी व्यक्ति से मिलने पर “नमस्ते” कहना भारतीय जीवन में सौम्यता और शिष्टाचार का परिचायक है। यही कारण है कि आज भी विश्व भर में “नमस्ते” भारतीय संस्कृति की पहचान बन चुका है। *नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे* से तो हम सभी परिचित हैं। “नमस्कार” शब्द में थोड़ी अधिक औपचारिकता और गाम्भीर्य है। यह अधिकतर तब कहा जाता है, जब हम किसी बड़े, किसी अधिकारी, या किसी सार्वजनिक समारोह में लोगों का सामूहिक अभिवादन करते हैं। इसमें “नमः” के साथ “कार” (क्रिया) जुड़कर पूर्णता और आचरण की गरिमा प...

सावन पूर्णिमा, रक्षाबंधन, संस्कृत दिवस और शिव की करुणामयी छाया

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 *सावन पूर्णिमा, रक्षाबंधन, संस्कृत दिवस और शिव की करुणामयी छाया* प्रस्तुति : डॉ धनंजय कुमार मिश्र ,विभागाध्यक्ष संस्कृत ,सिदो-कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय दुमका झारखंड  श्रावण मास की पूर्णिमा भारतीय संस्कृति का एक अद्वितीय पर्व-संगम है। इस दिन तीन महत्त्वपूर्ण अवसर एक साथ उपस्थित होते हैं—रक्षाबंधन, संस्कृत दिवस और देवघर-बासुकिनाथ के प्रसिद्ध श्रावणी मेले का समापन। सावन की हरियाली, आकाश में झूमते बादल, मंदिरों की गूँजती घंटियाँ और “हर-हर महादेव” का घोष—यह सब मिलकर भक्ति, संस्कृति और प्रकृति को एक सूत्र में पिरो देते हैं। सावन का महीना शिवभक्ति का चरम क्षण है। पूरे माह काँवरिये गंगाजल लेकर सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा कर बाबा बैद्यनाथ धाम, देवघर पहुँचते हैं। बेलपत्र, धतूरा, दूध, गंगाजल आदि का अर्पण कर वे अपने हृदय का प्रेम शिव चरणों में समर्पित करते हैं। सावन का समापन केवल तिथियों का परिवर्तन नहीं, बल्कि उस करुणामयी यात्रा का पूर्णत्व है, जहाँ भोलेनाथ हर आह्वान पर सहज ही प्रसन्न होते हैं— *भावग्रहणं न हि पूजनं विधिः।* शिव केवल भावना को ग्रहण करते हैं, न कि विधि-विधान की कठोरता को...

काल भैरव – समय के जाग्रत प्रहरी

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 *काल भैरव – समय के जाग्रत प्रहरी* प्रस्तुति: डॉ. धनंजय कुमार मिश्र,विभागाध्यक्ष संस्कृत ,सिदो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय दुमका झारखंड  ------- सावन का महीना शिव की आराधना का सबसे पवित्र समय माना जाता है। इस मास में भक्तजन जलाभिषेक, व्रत और भक्ति से भोलेनाथ को प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं। पर बहुत कम लोग जानते हैं कि शिव के विकराल रूप काल भैरव की पूजा भी सावन में विशेष महत्त्व रखती है। काल भैरव का नाम सुनते ही मन में एक अजीब-सी श्रद्धा और भय दोनों उत्पन्न होते हैं। यह स्वरूप हमें सिखाता है कि ईश्वर केवल करुणामय ही नहीं, न्यायकारी भी हैं। काल भैरव समय के स्वामी हैं—काल यानी समय, और भैरव यानी भय का नाश करने वाले। पौराणिक कथाओं में कहा गया है कि सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी अपने पाँच मुखों के घमंड में शिवजी का अपमान कर बैठे। शिव ने कुछ नहीं कहा, पर उनके क्रोध से एक प्रचंड ऊर्जा प्रकट हुई। यही शक्ति भैरव के रूप में प्रकट हुई। उन्होंने ब्रह्मा जी के पाँचवे मुख को काट दिया और संसार को यह संदेश दिया कि अहंकार का अंत निश्चित है। सावन का महीना हमें आत्मचिंतन की ओर ले जाता है। हम अपनी गलत...

कहानी: अंतिम आशा

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 कहानी: अंतिम आशा डॉ. धनंजय कुमार मिश्र ---------------- नेहा की आँखें थकी हुई थीं, चेहरा उदास और कपड़े धुले हुए होकर भी पुराने थे। परंतु इन सबसे अधिक फीका था उसका वह सपना, जो वर्षों से पालती आई थी एक अदद सरकारी नौकरी। यह नौकरी कोई विलास नहीं थी, बल्कि एक तिनके जैसी डूबते घर की नाव के लिए अंतिम सहारा थी। घर की हालत ऐसी थी कि दीवारें तक उधारी में जीती थीं। एक छोटा-सा आँगन, जिसमें एक तरफ टूटी हुई चौकी पड़ी थी, और दूसरी ओर पिता गोविन्द सिन्हा का खाँसता हुआ शरीर। नेहा जब रात में पढ़ती थी, तो उसकी भाभी माया जिसकी विद्या बस चूल्हे तक ही थी - ताने देने लगती, “दिन भर किताबों से चिपकी रहती है। भइया तो छत पर सीमेंट गिन रहे हैं, और मैडम यहाँ अफसर बनने चली हैं!” नेहा चुप रहती। चूल्हा जलाने से पहले वह अपने अन्दर जल चुकी होती थी। रामू, उसका भाई, जो पिता की उम्मीदों का पहला दीपक था, अब बुझे हुए दीयों में शामिल था। ठेकेदारी में उसका भविष्य ऐसा फँसा कि आज उसने अपना घर तक चौधरी टाइप बना लिया था। मोहल्ले में “रामू भइया” की दहाड़ थी, पर घर में पिता की दवाइयों तक की सुध नहीं थी। नेहा के लिए न उसका भाई ठहरा...