प्रतिमा
(एक घर की कहानी, जिसमें सब रहते थे, पर एक-दूसरे को समझता कोई नहीं था।) ---------- प्रतिमा पाँच भाई-बहनों में सबसे छोटी थी। पिता रामस्वरूप प्रसाद सरकारी महकमे में तृतीय श्रेणी के कर्मचारी थे। नौकरी ने उन्हें घर से दूर रखा और घर की जिम्मेदारियों ने उनकी पत्नी सावित्री देवी को कठोर बना दिया था। पिता शनिवार की देर शाम घर आते और सोमवार की भोर में लौट जाते। रविवार को कपड़े धुलते, राशन का हिसाब होता, बच्चों की शिकायतें सुनाई जातीं और घर के खर्च पर बहस होती। पिता कभी-कभी कुछ पूछते, फिर थकान का हवाला देकर सो जाते। घर में सब कुछ था—एक छत, रसोई, बच्चों के लिए बिस्तर और महीने के अंत में किसी तरह जुटा लिया जाने वाला राशन। बस, घर के लोगों के पास एक-दूसरे के मन की बात सुनने का समय नहीं था। सावित्री देवी घर को अपने ढंग से चलाती थीं। उनका अनुशासन ही घर का संविधान था। किसे क्या पढ़ना है, किसे कितना खर्च करना है, कौन किससे बात करेगा—सबके अपने नियम थे। बच्चों के बीच तुलना होती, कभी किसी की प्रशंसा तो कभी किसी की अवमानना। पिता के बड़े भाई, शिवनारायण प्रसाद, पास ही रहते थे। दोनों भाइयों में वर्षों से ...