उगना महादेव
(भक्ति, प्रेम और भगवान् शिव की सहज करुणा की एक लोककथा) डॉ धनंजय कुमार मिश्र ,विभागाध्यक्ष संस्कृत,एस के एम विश्वविद्यालय दुमका झारखंड ----- मिथिलांचल की धरती केवल अपनी उर्वरता, लोकसंस्कृति और मधुर भाषा के लिए ही विख्यात नहीं है, बल्कि उसकी मिट्टी में भक्ति की ऐसी सुगन्ध भी बसी है, जो सदियों से जनमानस को सुवासित करती आ रही है। यहाँ के खेतों में धान की बालियाँ जितनी सहजता से लहलहाती हैं, उतनी ही सहजता से लोकजीवन में शिव और शक्ति के प्रति श्रद्धा की धारा प्रवाहित होती है। मिथिला के कण-कण में महादेव की स्मृतियाँ हैं और उसके लोकगीतों में आज भी उस अनन्य भक्त की कथा गूँजती है, जिसके प्रेम ने स्वयं कैलासपति को अपना सेवक बना लिया था। वह भक्त थे महाकवि विद्यापति और उनके सेवक थे उगना—जो वस्तुतः कोई साधारण मनुष्य नहीं, साक्षात् भगवान् शिव थे। यह कथा केवल एक भक्त और भगवान् की नहीं, बल्कि उस प्रेम की है, जिसमें ईश्वर अपने भक्त के सामने अपना ऐश्वर्य भूल जाते हैं; उस विश्वास की है, जिसमें भगवान् अपने भक्त के घर चाकरी करने लगते हैं; और उस मानवीय दुर्बलता की भी, जो कभी-कभी अपने ही हाथों अपने सौभाग्...