रामनवमी: उत्सव नहीं, मानवता की परीक्षा
*रामनवमी: उत्सव नहीं, मानवता की परीक्षा*
डॉ धनंजय कुमार मिश्र विभागाध्यक्ष संस्कृत एस के एम विश्वविद्यालय दुमका
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वसन्त की मृदुल छाया में, जब प्रकृति नवजीवन का स्वप्न बुनती है, तब भारतीय मानस में एक अनुगूँज उठती है—राम। यह केवल एक नाम नहीं, यह मर्यादा का वह दीप है, जो युगों से मनुष्य के पथ को आलोकित करता आया है। रामनवमी का यह पर्व हमें बाह्य उल्लास से अधिक भीतर की कसौटी पर कसता है—कि क्या हम वास्तव में उस मर्यादा को जी पा रहे हैं, जिसका आदर्श श्रीराम ने स्थापित किया?
“सियाराममय सब जग जानी।
करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥”
यह दृष्टि केवल भक्ति नहीं, एक सांस्कृतिक चेतना है—जहाँ समस्त सृष्टि में एकात्म भाव दिखाई देता है।
राम का जीवन समाज के विविध वर्गों के बीच सेतु निर्माण का उदाहरण है। निषादराज, शबरी, सुग्रीव—इन सभी के साथ उनका व्यवहार यह सिद्ध करता है कि सामाजिक मर्यादा केवल पद या प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि संवेदना और समानता से निर्मित होती है।
आज जब समाज विभाजनों की रेखाओं में उलझता जा रहा है, राम का आचरण हमें स्मरण कराता है कि मर्यादा का अर्थ है—सबको साथ लेकर चलना, बिना भेदभाव के सम्मान देना।
राम भारतीय संस्कृति के जीवंत प्रतीक हैं—जहाँ धर्म कठोर नियम नहीं, बल्कि जीवन की मधुर लय है। वे परम्पराओं का पालन करते हुए भी संवेदनाओं को सर्वोपरि रखते हैं।
“रघुकुल रीति सदा चली आई।
प्राण जाए पर वचन न जाई॥”
यह केवल वचनपालन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अनुशासन का आदर्श है—जहाँ व्यक्ति अपने व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर सामूहिक विश्वास की रक्षा करता है।
राम का राजधर्म आज की राजनीति के लिए एक मौन प्रश्न है। सत्ता उनके लिए अधिकार नहीं, दायित्व थी। उनका शासन लोकमंगल का पर्याय था—
“दैहिक दैविक भौतिक तापा।
राम राज नहि काहुहि व्यापा॥”
आज जब राजनीति प्रायः स्वार्थ और संघर्ष का मंच बनती जा रही है, राम का आदर्श हमें सिखाता है कि सच्चा नेतृत्व वही है, जो जनकल्याण को सर्वोपरि रखे।
राम का सबसे बड़ा संघर्ष बाहरी नहीं, आंतरिक था। उन्होंने अपने व्यक्तिगत सुखों का त्याग कर धर्म और सत्य का मार्ग चुना। वनवास केवल एक घटना नहीं, आत्मसंयम की चरम अभिव्यक्ति है।
उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि मर्यादा का वास्तविक अर्थ है—
अपने भीतर के विकारों पर विजय पाना,
अहंकार को त्यागकर सत्य को अपनाना।
रामनवमी का यह पर्व हमें एक गम्भीर प्रश्न के सम्मुख खड़ा करता है—
क्या हमारे समाज में वह समरसता है?
क्या हमारी संस्कृति में वह संतुलन है?
क्या हमारी राजनीति में वह नैतिकता है?
और क्या हमारे व्यक्तिगत जीवन में वह अनुशासन है?
“रामहि केवल प्रेम पिआरा।
जानि लेहु जो जाननिहारा॥”
अंततः, राम केवल पूजन के विषय नहीं, बल्कि जीवन के अनुकरणीय आदर्श हैं।
रामनवमी हमें यह स्मरण कराती है कि सच्चा उत्सव बाहर नहीं, भीतर होता है—
जब हम अपनी मर्यादाओं को पहचानते हैं,
उन्हें जीने का साहस करते हैं,
और अपने भीतर के अंधकार को राम के प्रकाश से आलोकित करते हैं।
यही रामनवमी की सच्ची साधना है—
मौन, गम्भीर और मनुष्य को मनुष्य बनाने वाली।
— (रामनवमी विशेष)

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