पगली
सन् 1987 के आसपास की बात होगी।
दक्षिण बिहार का एक छोटा-सा कस्बा—नेतरहाट की तलहटी में, पहाड़ियों और जंगलों के बीच सिमटा हुआ। सर्दियाँ कड़ी थीं। शाम उतरते ही पहाड़ों से आती सर्द हवा कच्ची गलियों में भर जाती और रात होते-होते देह में उतरने लगती।
कस्बे के बाहर एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का भवन बन रहा था। दीवारें अधूरी थीं, छत पूरी नहीं हुई थी, खिड़कियों में पल्ले नहीं थे। ईंट, बालू और चूने के बीच खड़ा वह ढाँचा अस्पताल से अधिक किसी अधूरे वादे जैसा दिखाई देता था।
उसी भवन के एक कोने में एक जवान औरत आकर रहने लगी थी। बाईस-चौबीस वर्ष की होगी। न किसी को उसका नाम मालूम था, न गाँव, न घर।
सुबह वह कस्बे में निकलती—किसी के दरवाजे पर हाथ पसारती, कहीं से आधी रोटी, कहीं मुट्ठी भर चूड़ा, कहीं पिछली रात का बचा भात मिल जाता। जो मिलता, ले आती और उसी अधबने भवन के कोने में चुपचाप पड़ी रहती।
किसी ने पूछा नहीं कि वह आई कहाँ से। लोगों ने बस इतना देखा कि वह गर्भवती थी। फिर उसके बारे में बातें शुरू हुईं।
“पगली है।”
“किसी के साथ भागी होगी।”
“किसी ने छोड़ दिया होगा।”
“अवैध बच्चा है।”
एक-एक करके बातें बढ़ती गईं; और बिना किसी प्रमाण के एक पूरा चरित्र गढ़ दिया गया।
बीस-पच्चीस दिन इसी तरह बीत गए।
एक रात उस अधूरे भवन से नवजात शिशु के रोने की आवाज निकली।
सुबह तक खबर पूरे कस्बे में फैल चुकी थी—पगली ने बच्चा जना है।
लोग देखने आए।
वह स्त्री दीवार से लगी पड़ी थी। चेहरा पीला, आँखें बुझी हुईं; मगर बाँहों में बच्चा था। वह उसे ऐसे सीने से लगाए थी, जैसे उसके पास संसार में बचा हुआ आखिरी सहारा वही हो।
किसी ने बच्चे के पिता का नाम पूछा।
वह चुप रही।
किसी ने उसके घर का पता पूछा।
वह चुप रही।
किसी ने फिर पूछा।
वह तब भी चुप रही।
उसका मौन ही उसका उत्तर था।
तीन दिन बाद, उसी कोने में वह मृत मिली।
सुबह की ठंड में उसका शरीर पत्थर हो चुका था।
बच्चा अब भी उसके सीने से लगा था।
माँ की छाती में दूध नहीं था, देह में प्राण नहीं थे—फिर भी उसकी बाँहें बच्चे को घेरे हुए थीं।
लोगों ने माँ को उठा लिया।
बच्चे को किसी ने गोद में ले लिया।
किसी ने कहा—“अब इसका क्या होगा?”
लेकिन कोई उत्तर देने वाला नहीं था।
शाम ढलने लगी।
पहाड़ियों से फिर वही ठंडी हवा उतर आई।
और सूर्य के डूबने से पहले—
बच्चे ने भी माँ के पीछे-पीछे इस दुनिया से विदा ले ली।
उस दिन उस अधूरे भवन में कोई चीख नहीं उठी।
बस एक ऐसी खामोशी उतर आई, जिसमें शायद पहली बार उस स्त्री की पूरी कहानी सुनाई दे रही थी—जिसे कस्बे ने जीते-जी केवल एक नाम दिया था—
पगली।
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