शिव की महिमा अनन्त

 



प्रस्तुति : डॉ धनंजय कुमार मिश्र 

विभागाध्यक्ष, संस्कृत 

एस के एम विश्वविद्यालय दुमका झारखंड 

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श्रावण की पावन फुहारें केवल धरा की पिपासा शांत नहीं करतीं, अपितु चेतना के उस मरुस्थल को भी नवजीवन प्रदान करती हैं जो जन्मांतरों के  पाप-ताप से दग्ध पड़ा हो। श्रावण मास और देवाधिदेव महादेव का संबंध केवल तिथियों का संयोग नहीं, अपितु करुणा, क्षमा और अनन्य कृपा का असीम अनुष्ठान है। शिवत्व वह परम चेतना है जहाँ बहिष्करण का कोई स्थान नहीं—केवल स्वीकार्य और आलिंगन है; जहाँ दंड का विधान नहीं, केवल जीव का परम उद्धार है। 'शिव महापुराण' की अमर गाथा इसी सत्य का उद्घोष करती है कि जब निश्छल भक्ति और भगवत्कथा का मिलन होता है, तो निकृष्टतम योनि में पड़ा जीव भी परम-पद का अधिकारी बन जाता है।

"​दुराचार की छाया और अधोगति की परिणति"

​संसार में चेतना का भटकाव कोई नवीन विषय नहीं है। बिंदुग भी ऐसे ही भटके हुए मानव-मन का प्रतीक था। विप्र कुल में जन्म लेकर भी वह वैदिक मर्यादाओं, धर्म और सदाचार से सर्वथा विमुख रहा। काम, क्रोध और स्वार्थ के वशीभूत होकर उसने कुमार्ग का चयन किया। इस पथभ्रष्टता और अधर्म का दुष्परिणाम यह हुआ कि देहावसान के उपरांत उसे घोर पिशाच (प्रेत) योनि प्राप्त हुई। बिंदुग का यह स्वरूप इस चिरंतन सत्य को रेखांकित करता है कि विवेक से रहित जीवन अंततः आत्मा को गहन अंधकार और यातना के गर्त में धकेल देता है।

​"तमस में प्रकाश-पुंज : चंचुला की अनन्य निष्ठा"

​जहाँ बिंदुग अधर्म का अंधकार था, वहीं उसकी धर्मपत्नी चंचुला निश्चल भक्ति और धर्मपरायणता की साक्षात् मूरत थी। पति के प्रेत योनि में पतित होने के संताप ने उसके विश्वास को क्षीण नहीं किया, अपितु उसे आशुतोष शिव के और अधिक समीप ला दिया। उसने निराशा के स्थान पर महादेव के अभय चरणों की शरण ली। चंचुला की यह प्रार्थना सिद्ध करती है कि वास्तविक भक्ति केवल व्यक्तिगत मोक्ष की अभिलाषा नहीं, अपितु भटके हुए प्रियजनों के उद्धार की असीम तड़प भी है। जब आतुर हृदय से शिव का आवाह्न किया जाता है, तो कैलाशपति का करुणा-सागर उद्वेलित हो उठता है।

​"विंध्याचल का धरातल और शिव-कथा का प्रस्फुटन"

​चंचुला की आर्त्तपुकार जब जगज्जननी माता पार्वती के चरणों तक पहुँची, तो उनकी आज्ञा से गंधर्वराज तुम्बुरु चंचुला को साथ लेकर विंध्याचल पर्वत की ओर प्रवृत्त हुए। विंध्याचल का वह निर्जन वनांचल, जहाँ बिंदुग पिशाच रूप में भटक रहा था, सहसा एक पावन सत्संग-स्थल में परिवर्तित हो गया। तुम्बुरु ने बिंदुग के उपद्रवी प्रेत-शरीर को संयमित करने हेतु उसे बाँधा, ताकि उसका अशांत चित्त कथा के अमृत को ग्रहण करने में समर्थ हो सके।

​तदोपरांत गंधर्वराज के मुखारविंद से 'शिव महापुराण' की कथा की वह पीयूष-धारा प्रवाहित हुई, जिसने संपूर्ण वातावरण को दिव्य स्पंदन से आप्लावित कर दिया।

"​शब्द-ब्रह्म से कायाकल्प : प्रेत-भाव से परम-पद"

​शास्त्रों में शब्द को ब्रह्म कहा गया है, और जब वह शब्द शिव-गाथा बन जाए तो प्रारब्ध के कठोरतम विधान भी शिथिल हो जाते हैं। जैसे-जैसे शिव पुराण का अमृत बिंदुग के कर्ण-रंध्रों में प्रवेश करने लगा, उसके जन्मांतरों के पाप-संस्कार भस्मीभूत होने लगे। शिव-नाम की पावन ध्वनि ने उसके पिशाचत्व के आवरण को पूर्णतः प्रक्षालित कर दिया।

​कथा के विश्राम तक एक अलौकिक चमत्कार घटित हुआ। वह भयानक और कुरूप पिशाच अपना प्रेत-शरीर त्यागकर दिव्य, कांतिमान और शिव-गण के समान तेजस्वी स्वरूप में रूपांतरित हो गया। जो बिंदुग कभी पाप की प्रतिमूर्ति था, वही शिव-कथा के प्रभाव से पिशाच योनि से मुक्त होकर परम पद को प्राप्त हुआ।

वस्तुत: सावन का यह पावन समय हमें यही संदेश देता है कि अपराध कितना भी गहन क्यों न हो, शिव की करुणा का विस्तार उससे कहीं अधिक विशाल है। बिंदुग का उद्धार इस तथ्य का प्रमाण है कि शिव-कथा केवल श्रवण का विषय नहीं, अपितु अंतःकरण को शुद्ध करने वाली परम औषधि है। इस पुनीत मास में यदि हम भी अपने भीतर व्याप्त अज्ञान रूपी पिशाचत्व को भक्ति और कथा-श्रवण के प्रति समर्पित कर दें, तो हमारा जीवन भी शिवत्व की अमर कांति से भास्वर हो सकता है।

हर हर महादेव! 

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