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महाशिवरात्रि

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  डाॅ.धनंजय कुमार मिश्र  अध्यक्ष, स्नातकोत्तर संस्कृत विभाग  सिदो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय, दुमका dkmishraspcd@gmail.com ----------- भारतीय पौराणिक मान्यताओं के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु और महेश त्रिदेव हैं । ब्रह्मा सृष्टि के उत्पत्तिकर्त्ता, विष्णु जगत् के पालनकर्त्ता और शिवशंकर महेश संसार के संहारकर्त्ता महाकाल हैं । उत्पत्ति, पालन और लय यही संसार की गति है। त्रिदेवों में भगवान शंकर को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। भगवान् ब्रह्मा जहाँ  स्रष्टा हैं , भगवान विष्णु संरक्षक तो भगवान शिव विनाशक की भूमिका निभाते हैं। त्रिदेव मिलकर प्रकृति के नियम का संकेत देते हैं कि जो उत्पन्न हुआ है, उसका विनाश भी होना तय है। कई पुराणों का मानना है कि भगवान् ब्रह्मा और भगवान् विष्णु साक्षात् शिव से उत्पन्न हुए हैं । कभी-कभी  शिवभक्तों के मन में सवाल उठता है कि भगवान् शिव ने कैसे जन्म लिया था? अर्थात् शिव की उत्पत्ति कैसे हुई? इसके उत्तर में शिव पुराण कहता है कि भगवान् शिव स्वयंभू हैं। अर्थात्  वह किसी शरीर से पैदा नहीं हुए हैं। जब कुछ नहीं था तो भगवान् शिव थे और सब कुछ नष्ट...

वायु और प्राण प्राचीन भारतीय दृष्टि एक अध्ययन

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  उत्तर तथा पश्चिम दिशा के मध्य कोण को वायव्य कहते है।इस दिशा का स्वामी या देवता वायुदेव है।वायु पञ्च होते है :- प्राण, अपान, समान, व्यान, और उदान।  हर एक मनुष्य के जीवन के लिए पाँचों वायु परम आवश्यकत होता है। पांचो का शरीर में रहने का स्थान अलग-अलग जगह पर होता है। हमारा शरीर जिस तत्व के कारण जीवित है, उसका नाम ‘प्राण’ है। शरीर में हाथ-पाँव आदि कर्मेन्द्रियां, नेत्र-श्रोत्र आदि ज्ञानेंद्रियाँ तथा अन्य सब अवयव-अंग इस प्राण से ही शक्ति पाकर समस्त कार्यों को करते है।  प्राण से ही भोजन का पाचन, रस, रक्त, माँस, मेद, अस्थि, मज्जा, वीर्य, रज, ओज आदि सभी धातुओं का निर्माण होता है तथा व्यर्थ पदार्थों का शरीर से बाहर निकलना, उठना, बैठना, चलना, बोलना, चिंतन-मनन-स्मरण-ध्यान आदि समस्त स्थूल व सूक्ष्म क्रियाएँ होती है।   प्राण की न्यूनता-निर्बलता होने पर शरीर के अवयव शिथिल व मृतप्राय हो जाते है। प्राण के बलवान होने पर समस्त शरीर के अवयवों में बल, पराक्रम आते है और पुरुषार्थ, साहस, उत्साह, धैर्य, आशा, प्रसन्नता, तप, क्षमा, आदि की प्रवृत्ति होती है।शरीर के बलवान व निरोग होने पर...

प्रदोष व्रत शिव की उपासना

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  *डाॅ.धनंजय कुमार मिश्र* हिन्दू धर्म में प्रदोष व्रत का विशेष महत्व है। इस दिन भगवान शिव की विशेष उपासना का विधान है। शास्त्रों में इस दिन के लिए कई नियम और पूजा विधि बताए गए हैं। जिन्हें करने से भक्तों को विशेष लाभ मिलता है। सनातन धर्म में कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन भगवान शिव को समर्पित प्रदोष व्रत रखा जाता है। इस दिन भगवान शिव की विशेष पूजा का विधान है। शास्त्रों में बताया गया है कि जो व्यक्ति प्रदोष व्रत के दिन नियम और पूजा विधि को ध्यान में रखते हुए महादेव की आराधना करता है, उन्हें जीवन में सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि प्रदोष व्रत से जुड़े नियमों का ज्ञान होना बहुत जरूरी है। साथ ही इस व्रत से जुड़े नियमों का उल्लेख स्कंद पुराण में विस्तार से किया गया है। आइए जानते हैं प्रदोष व्रत से जुड़े नियम, पूजा विधि और मंत्र। शास्त्रों में बताया गया है कि प्रदोष व्रत के दिन व्यक्ति को सुबह के समय स्नान-ध्यान कर के भगवान शिव का स्मरण करना चाहिए। व्रत की अवधि में नमक का सेवन बिलकुल ना करें और इस दिन किसी से भी विवाद मोल लेने से बचें। साथ ही इस दिन ब्रह्...

प्रबोधचन्द्रोदय एक सामान्य अध्ययन

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  प्रबोधचन्द्रोदय एक संस्कृत नाटक है। यह एक प्रतीकात्मक नाटक है। इसके रचयिता श्री कृष्ण मिश्र हैं। इसकी रचना चन्देल राजवंश के काल ( 1100 ई. - ग्यारहवीं सदी) में हुई थी। कृष्ण मिश्र चंदेल नरेश कीर्तिवर्मा के समकालीन थे। इस नाटक का मंचन खजुराहो के मंदिर प्रांगण में किया गया था। यह भावप्रधान प्रतीकात्मक नाटक है तथा समकालीन संस्कृति का दर्पण है। विद्वानों ने प्रबोधचन्द्रोदय को प्रतीकात्मक शैली का एक जीवन्त नाट्य बताया है। इस नाटक में छः अङ्क हैं। सभी पात्र प्रतीकात्मक हैं, जिनके नाम हैं- परमार्थतत्त्व, माया, महामोह, विवेक, रति, काम, उपनिषद (स्त्री पात्र), मति, दम्भ, अहंकार, चार्वाक, धर्म, शान्ति, करुणा, श्रद्धा, जैनमत (क्षपणक), बौद्धमत (भिक्षु), सोमसिद्धान्त (कापालिक), विष्णुभक्ति, वस्तुविचार, क्षमा, सन्तोष, प्रवृत्ति, निवृत्ति, मधुमती आदि। इस नाटक में बताया गया है कि मोहपाश से आबद्ध होकर मानव अपने सत्य स्वरूप को भूल जाता है। विवेक के द्वारा जब मोह पराजित होता है तब पुरुष को शाश्वत ज्ञान की प्राप्ति होती है। विवेकपूर्वक उपनिषद का अध्ययन करने तथा विष्ण्णुभक्ति का आश्रय लेने से ही ज्ञान ...

पाणिनि और उनका अष्टाध्यायी

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अष्टाध्यायी  (अष्टाध्यायी = आठ अध्यायों वाली) महर्षि  पाणिनि  द्वारा रचित  संस्कृत   व्याकरण  का एक अत्यंत प्राचीन ग्रंथ (7०० ई पू) है। इसमें आठ अध्याय हैं; प्रत्येक अध्याय में चार पाद हैं; प्रत्येक पाद में 38 से 220 तक  सूत्र  हैं। इस प्रकार अष्टाध्यायी में आठ अध्याय, बत्तीस पाद और सब मिलाकर लगभग 4000  सूत्र  हैं। अष्टाध्यायी पर महामुनि  कात्यायन  का विस्तृत वार्तिक ग्रन्थ है और सूत्र तथा वार्तिकों पर भगवान  पतंजलि  का विशद विवरणात्मक ग्रन्थ  महाभाष्य  है। संक्षेप में सूत्र, वार्तिक एवं महाभाष्य तीनों सम्मिलित रूप में ' पाणिनीय व्याकरण'  कहलाता है और सूत्रकार पाणिनी, वार्तिककार कात्यायन एवं भाष्यकार पतंजलि - तीनों व्याकरण के ' त्रिमुनि'  कहलाते हैं।   अष्टाध्यायी में   आठ अध्याय   हैं और प्रत्येक अध्याय में चार पाद हैं। पहले दूसरे अध्यायों में संज्ञा और परिभाषा संबंधी सूत्र हैं एवं वाक्य में आए हुए क्रिया और संज्ञा शब्दों के पारस्परिक संबंध के नियामक प्रकरण भी हैं, जैसे क्रिया के लि...

एक बार फिर गांधी को याद करते हुए

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                                                   भारत महापुरुषों का देश है | यहाँ पर मानव क्या ईश्वर भी अवतरित हुए हैं ,राम और कृष्ण को हमारी परम्परा में ईश्वर माना जाता है |इसी तरह चाणक्य ,चन्द्रगुप्त , महाराणा प्रताप ,गुरुगोविन्द सिंह , महात्मा गांधी, सुभाषचन्द्र बोस  सरदार बल्लभभाई  पटेल  बालगंगाधर तिलक  आदि लोकनायक   महापुरुष भी अवतरित हुए हैं जिनके पराक्रम ,पौरुष .त्याग और समर्पण से राष्ट्र का  मस्तक सदैव  गौरवान्वित होता रहता है |ऐसे ही  महापुरुष महात्मा गांधी भी हैं   ,जिन्हें  राष्ट्रीय प्रतीक पुरुष के रूप में जाना जाता है |महात्मा गांधी  का मूल नाम मोहनदासकर्मचंद गांधी था | जिनका जन्म ०२ अक्तूबर १८६९ ई.में गुजरात के पोरबंदर नामक स्थान में  हुआ था |महात्मा गांधी के पिता का नाम कर्मचंद गांधी तथा माता का नाम श्रीमति पुतली बाई  था | गांधीजी बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि सम्पन्न और अ...

ऋषि पंचमी भारत की अद्भुत परम्परा

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 भाद्रपद (भादो) शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को  ऋषि पंचमी के व्रत का विधान भारतीय प्राचीन ग्रंथों व पुराणों  में बताया गया है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है इस दिन ऋषियों का पूजन, वन्दन व स्मरण किया जाता है। ऋषि पंचमी कोई उत्सव नहीं है और न ही इस दिन किसी आराध्य देव की पूजा की जाती है, बल्कि इस दिन सप्त ऋषियों का स्मरण कर श्रद्धा के साथ उनका पूजन किया जाता है। हमारे शास्त्रों में कश्यप, अत्रि, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वसिष्ठ ये सात ऋषि बताए गए हैं। इन सप्त ऋषियों के निमित्त उनका स्मरण करते हुए महिलाओं के द्वारा व्रत का विधान हमारे शास्त्रों में बताया गया है। ऐसा माना जाता है कि इस व्रत के रखने से महिलाएँ रजस्वला दोष से मुक्त हो जाती हैं। व्रत के साथ यदि व्रतधारी महिलाएं इस दिन गंगा स्नान भी कर लें तो उन्हें व्रत का फल कई गुणा ज्यादा मिल जाता है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि इस व्रत को रखने से महिलाओं के आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक दु:खों का विनाश हो जाता है। इस व्रत को करने से उपासक द्वारा जाने अनजाने में किए गए सभी दोषों से उसको मुक्ति मिल जाती है।