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पाणिनि और उनका अष्टाध्यायी

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अष्टाध्यायी  (अष्टाध्यायी = आठ अध्यायों वाली) महर्षि  पाणिनि  द्वारा रचित  संस्कृत   व्याकरण  का एक अत्यंत प्राचीन ग्रंथ (7०० ई पू) है। इसमें आठ अध्याय हैं; प्रत्येक अध्याय में चार पाद हैं; प्रत्येक पाद में 38 से 220 तक  सूत्र  हैं। इस प्रकार अष्टाध्यायी में आठ अध्याय, बत्तीस पाद और सब मिलाकर लगभग 4000  सूत्र  हैं। अष्टाध्यायी पर महामुनि  कात्यायन  का विस्तृत वार्तिक ग्रन्थ है और सूत्र तथा वार्तिकों पर भगवान  पतंजलि  का विशद विवरणात्मक ग्रन्थ  महाभाष्य  है। संक्षेप में सूत्र, वार्तिक एवं महाभाष्य तीनों सम्मिलित रूप में ' पाणिनीय व्याकरण'  कहलाता है और सूत्रकार पाणिनी, वार्तिककार कात्यायन एवं भाष्यकार पतंजलि - तीनों व्याकरण के ' त्रिमुनि'  कहलाते हैं।   अष्टाध्यायी में   आठ अध्याय   हैं और प्रत्येक अध्याय में चार पाद हैं। पहले दूसरे अध्यायों में संज्ञा और परिभाषा संबंधी सूत्र हैं एवं वाक्य में आए हुए क्रिया और संज्ञा शब्दों के पारस्परिक संबंध के नियामक प्रकरण भी हैं, जैसे क्रिया के लि...

एक बार फिर गांधी को याद करते हुए

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                                                   भारत महापुरुषों का देश है | यहाँ पर मानव क्या ईश्वर भी अवतरित हुए हैं ,राम और कृष्ण को हमारी परम्परा में ईश्वर माना जाता है |इसी तरह चाणक्य ,चन्द्रगुप्त , महाराणा प्रताप ,गुरुगोविन्द सिंह , महात्मा गांधी, सुभाषचन्द्र बोस  सरदार बल्लभभाई  पटेल  बालगंगाधर तिलक  आदि लोकनायक   महापुरुष भी अवतरित हुए हैं जिनके पराक्रम ,पौरुष .त्याग और समर्पण से राष्ट्र का  मस्तक सदैव  गौरवान्वित होता रहता है |ऐसे ही  महापुरुष महात्मा गांधी भी हैं   ,जिन्हें  राष्ट्रीय प्रतीक पुरुष के रूप में जाना जाता है |महात्मा गांधी  का मूल नाम मोहनदासकर्मचंद गांधी था | जिनका जन्म ०२ अक्तूबर १८६९ ई.में गुजरात के पोरबंदर नामक स्थान में  हुआ था |महात्मा गांधी के पिता का नाम कर्मचंद गांधी तथा माता का नाम श्रीमति पुतली बाई  था | गांधीजी बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि सम्पन्न और अ...

ऋषि पंचमी भारत की अद्भुत परम्परा

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 भाद्रपद (भादो) शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को  ऋषि पंचमी के व्रत का विधान भारतीय प्राचीन ग्रंथों व पुराणों  में बताया गया है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है इस दिन ऋषियों का पूजन, वन्दन व स्मरण किया जाता है। ऋषि पंचमी कोई उत्सव नहीं है और न ही इस दिन किसी आराध्य देव की पूजा की जाती है, बल्कि इस दिन सप्त ऋषियों का स्मरण कर श्रद्धा के साथ उनका पूजन किया जाता है। हमारे शास्त्रों में कश्यप, अत्रि, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वसिष्ठ ये सात ऋषि बताए गए हैं। इन सप्त ऋषियों के निमित्त उनका स्मरण करते हुए महिलाओं के द्वारा व्रत का विधान हमारे शास्त्रों में बताया गया है। ऐसा माना जाता है कि इस व्रत के रखने से महिलाएँ रजस्वला दोष से मुक्त हो जाती हैं। व्रत के साथ यदि व्रतधारी महिलाएं इस दिन गंगा स्नान भी कर लें तो उन्हें व्रत का फल कई गुणा ज्यादा मिल जाता है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि इस व्रत को रखने से महिलाओं के आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक दु:खों का विनाश हो जाता है। इस व्रत को करने से उपासक द्वारा जाने अनजाने में किए गए सभी दोषों से उसको मुक्ति मिल जाती है।

गणेश चतुर्थी के दिन चन्द्रदर्शन वर्जित

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  भाद्रपद (भादो) शुक्ल पक्ष चतुर्थी अर्थात्  गणेश चतुर्थी । आज के दिन भगवान गणेश की विधि- विधान से पूजा- अर्चना की जाती है। गणेश चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक दश दिनों के गणेश महोत्सव की शुरुआत  आज से ही की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान गणेश की कृपा से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। भगवान गणेश प्रथम पूजनीय देव हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गणेश चतुर्थी पर रात्रि में चंद्र देव के दर्शन नहीं करने चाहिए। ऐसा माना जाता है कि इस दिन चंद्रमा का दर्शन करने से झूठा कलंक अथवा आक्षेप लगने की संभावना होती है। गणेश चतुर्थी के दिन चंद्रमा के दर्शन करना अपशगुन माना जाता है।  गलती से अगर चंद्रमा के दर्शन हो जाएँ तो उन्हें प्रणाम कर लें और घर आकर के मिष्ठान अथवा फल फूल उनके निमित्त उनको समक्ष दिखा कर दान कर देना चाहिये । गणेश जी के किसी मंत्र का जाप करना  या गणेश स्तोत्र  का पाठ करना चाहिए । पौराणिक मान्यताओं के अनुसार  भगवान श्रीगणेश ने चंद्रमा को शाप दे दिया था। चन्द्रमा ने परिहास में उपहास  कर दिया था लम्बोदर गणेश जी का । पौराणिक कथा...

प्रकृति की पूजा है चौरचन पर्व

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भादो महीना के शुक्ल पक्ष चतुर्थी  को जहाँ गणेश चतुर्थी का पर्व धूम धाम से मनाया जाता है वहीं मिथिलांचल में आज की तिथि को चौरचन पर्व के रूप में मनाने की काफी पुरानी परंपरा है। मिथिला में चौरचन का त्योहार पूरे धूमधाम से मनाया जाता है। चौरचन को चौठचंद्र भी बोलते हैं। अपभ्रंश भाषा में चोरचण्डा  इसे ही कहते हैं ।मिथिला में मनाया जाने वाला चौठचंद्र ऐसा त्योहार जिसमें चांद की पूजा बड़े धूमधाम से की जाती है। मिथिला के अधिकांश त्योहारों का नाता प्रकृति से जुड़ा होता है। ये व्रत पुत्र की दीर्घायु के लिए किया जाता है। झारखण्ड के  गोड्डा, दुमका, देवघर सहित न केवल संताल परगना में अपितु राँची, बोकारो, धनबाद, जमशेदपुर  आदि शहरों में भी बड़ी संख्या में मिथिलावासी रहते हैं। ऐसे में ये पर्व यहां भी बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। प्रायः यह व्रत महिलाएं ही करती हैं ।  चौरचन के दिन मिथिला की महिलाएं पूरे दिन उपवास करती हैं। इसके साथ ही शाम को भगवान गणेश की पूजा के साथ चांद की विधि विधान से पूजा कर अपना व्रत तोड़ती हैं। पूजा स्थल पर पिठार (पीसे चावल से) से अरिपन बनाया जाता है। फिर उसी...

 भारत जनगणना 2021 विशेष

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डॉ धनञ्जय कुमार मिश्र  दुमका (झारखण्ड) dkmishraspcd@gmail.com ----- हाल ही में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री ने जनगणना 2021 का शुभंकर जारी किया है। ज्ञातव्य है कि केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 24 दिसंबर, 2019 को भारत की जनगणना 2021 की प्रक्रिया शुरू करने एवं राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (National Population Register- NPR) को अपडेट करने की मंज़ूरी दे दी थी। इसके तहत पूरे देश में जनगणना का कार्य दो चरणों में संपन्न किया जाएगा। सरकारी अनुमान के अनुसार, जनगणना 2021 की प्रक्रिया पूरी करने में 8,754 करोड़ 23 लाख रूपए का खर्च आएगा। इस प्रक्रिया में देश के विभिन्न राज्यों के अलग-अलग विभागों के 30 लाख कर्मचारी भाग लेंगे, जबकि NPR के लिये 3941 करोड़ 35 लाख रूपए का खर्च आएगा। ज्ञातव्य है कि वर्ष 2011 की जनगणना में देश भर से लगभग 27 लाख कर्मचारियों ने अपना योगदान दिया था। किसी भी देश के विकास एवं उसके भविष्य की नीतियों के निर्धारण के लिये देश के नागरिकों की सही संख्या का पता होना बहुत ज़रूरी होता है। नागरिकों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति के प्रमाणिक आँकड़े सरकार की मदद करते हैं, अत: भारत में प्रत्येक 10 साल पर ज...

आनन्दवर्धन और उनका ध्वन्यालोक

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 आनन्दवर्धन, काव्यशास्त्र में ध्वनि सम्प्रदाय के प्रवर्तक के रूप में प्रसिद्ध हैं। काव्यशास्त्र के ऐतिहासिक पटल पर आचार्य रुद्रट के बाद आचार्य आनन्दवर्धन आते हैं और इनका ग्रंथ ‘ध्वन्यालोक’ काव्य शास्त्र के इतिहास में मील का पत्थर है। आचार्य आनन्दवर्धन कश्मीर के निवासी थे और ये तत्कालीन कश्मीर नरेश अवन्तिवर्मन के समकालीन थे। इस सम्बंध में महाकवि कल्हण ‘राजतरंगिणी’ में लिखते हैं: कश्मीर नरेश अवन्तिवर्मन का राज्यकाल 855 से 884 ई. है। अतएव आचार्य आनन्दवर्धन का काल भी नौवीं शताब्दी मानना चाहिए। इन्होंने पाँच ग्रंथों की रचना की है- विषमबाणलीला, अर्जुनचरित, देवीशतक, तत्वालोक और ध्वन्यालोक।  ध्वनि सिद्धान्त, भारतीय काव्यशास्त्र का एक सम्प्रदाय है। भारतीय काव्यशास्त्र के विभिन्न सिद्धान्तों में यह सबसे प्रबल एवं महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त है। ध्वनि सिद्धान्त का आधार 'अर्थ ध्वनि' को माना गया है। इस सिद्धान्त की स्थापना का श्रेय 'आनंदवर्धन' को है किन्तु अन्य सम्प्रदायों की तरह ध्वनि सिद्धान्त का जन्म आनंदवर्धन से पूर्व हो चुका था। स्वयं आनन्दवर्धन ने अपने पूर्ववर्ती विद्वानों का मतोल्...