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आज सीखते हैं षड्यंत्र

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 *आज सीखते हैं षड्यंत्र* षड्यंत्र= षट्+यन्त्र  षड्यंत्र शब्द प्राचीन संस्कृत में नहीं मिलता।माना जाता है कि इसकी उत्पत्ति बौद्धों की तंत्र-मंत्र विधियों से हुई है। षड्यंत्र शब्द का अर्थ है - किसी छिपे हुए या हानिकारक उद्देश्य को पूरा करने के लिए गुप्त योजना बनाना। इसमें अक्सर छल या अवैध गतिविधियां शामिल होती हैं। षड्यंत्र में मूलतः षट् (छ:) यंत्र होते हैं - जारण(जलाना) मारण(मारना)  उच्चाटन, मोहन (वशीकरण), स्तंभन और विध्वंसन । षड्यंत्र दो या दो से ज़्यादा लोगों के बीच तय एक अवैध काम करने के लिए समझौता होता है। षड्यंत्र के दो प्रकार होते हैं - सिविल और आपराधिक। सिविल षड्यंत्र में, लोग दूसरों को धोखा देते हैं या उनके कानूनी अधिकारों के साथ धोखाधड़ी करते हैं। आपराधिक षड्यंत्र में, लोग भविष्य में कानून तोड़ने के लिए समझौता करते हैं। आधुनिक संस्कृत शब्द षड्यंत्र की व्युत्पत्ति क्या है? क्या यह संगठित षड्यंत्र के कुछ प्राचीन 6 उपकरणों की ओर इशारा करता है?  यह शब्द कैसे आया, क्योंकि हमें किसी भी संस्कृत शब्दकोश में इसका सटीक शब्द नहीं मिला। फिर भी, इस शब्द का उपयोग करने वाली...

संस्कृत व्याकरण के प्रमुख अव्यय

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Dr.D K MISHRA, HOD SANSKRIT  S K M UNIVERSITY DUMKA JHARKHAND  भाषा और व्याकरण का सम्बन्ध शाश्वत है। व्याकरण के बिना भाषा का शुद्ध प्रयोग नहीं किया जा सकता। संस्कृत जैसी शास्त्रीय भाषा तो व्याकरण के रथ पर सवार होकर ही चलती है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि संस्कृत भाषा की आत्मा उसके व्याकरण में निहित है। संस्कृत व्याकरण को शब्दानुशासन भी कहते हैं क्योंकि व्याकरण भाषा को अनुशासित करता है। अस्तु! संस्कृत भाषा में अव्यय उन शब्दों को कहते हैं जिनका रूप सातों विभक्तियों, तीनों कालों, तीनों वचनों और तीनों लिंगों में एक समान रहता है, कभी बदलता नहीं है - "सदृशं त्रिषु लिंगेषु, सर्वासु च विभक्तिषु। वचनेषु च सर्वेषु यन्नव्येति तदव्ययम्।। यहां हम कुछ ऐसे अव्ययों को अभी देखेंगे जिनका प्रयोग संस्कृत भाषा में आसानी से देखा जा सकता है - 1. अपि = भी 2. अथ = इसके बाद  3. अधुना = अभी 4. अद्य = आज 5. अद्यत्वे= आजकल  6. अकस्मात्= अचानक  7. अभित: = दोनों ओर  8. इतस्तत: = इधर - उधर  9. इव = तरह  10. ईषत् = कुछ  11. उभयत: = दोनों ओर 12. ऋते = विना 13. उच्चै: =...

संस्कृत की कालजयी रचनाएं

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Dr. D K MISHRA   भारतीय साहित्य और संस्कृति में संस्कृत भाषा का अप्रतिम योगदान रहा है। ज्ञान-विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में संस्कृत भाषा में अनेक कालजयी रचनाएं हैं, इन रचनाओं का महत्त्व बहुविध है। साहित्य , गणित, विज्ञान, दर्शन, धर्म ,अर्थ, काम आदि विषयों पर कुछ कालजयी ग्रन्थों और उनके रचनाकार के विषय में देखते हैं - 1. रामायण (आदि काव्य) - महर्षि वाल्मीकि  2. महाभारत - कृष्ण द्वैपायन व्यास  3. बुद्धचरितम् - अश्वघोष  4. अर्थशास्त्र - विष्णु गुप्त (कौटिल्य, चाणक्य) 5. मनुस्मृति - महर्षि मनु  6. अष्टाध्यायी - आचार्य पाणिनि  7. कामसूत्र - वात्स्यायन  8. योगसूत्र - पतंजलि  9. राजतरंगिणी - कल्हण  10. मेघदूतम् - कालिदास  11. अभिज्ञानशाकुन्तलम् - कालिदास  12. अमरकोश(नामलिंगानुशासनम्) - अमरसिंह  13.नाट्यशास्त्र - भरत मुनि 14. छ्न्द: सूत्र - आचार्य पिंगल  15. ज्योतिष शास्त्र - आचार्य लगध 16. आर्यभटीयम् - आर्यभट्ट  17. चरक संहिता - आचार्य चरक  18. सुश्रुत संहिता - आचार्य सुश्रुत  19. काव्य प्रकाश - आचार्य मम्मट...

रूपक और इसके भेद

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डॉ धनंजय कुमार मिश्र, विभागाध्यक्ष संस्कृत,  एस के एम विश्वविद्यालय दुमका, झारखंड                 संस्कृत साहित्य में दृश्यकाव्य के अन्तर्गत अभिनय का नट आदि में रामादि के स्वरूप का आरोप होने से दृश्यकाव्य को ही रूपक कहा जाता है। रूपक अभिनय के योग्य होता है। कहा भी गया है - ‘‘रूपारोपात्तुरूपकम्’       आचार्य धनंजय ने रूपक का विवेचन इस प्रकार किया है - ‘‘अवस्थानुकृतिर्नाट्यम् । रूपं दृश्यतोच्यते। रूपकं तत्समारोपात्।’’ अर्थात् अवस्था-अनुकरण नाट्य है। दृश्य काव्य के अन्तर्गत नाट्य आता है। अतः पात्रों को विभिन्न रंग-रूपों, भाव-भङ्गिमाओं आदि में देखा जाता है। चक्षुग्राह्य होने के कारण नाट्य ‘रूप’ नाम से भी जाना जाता है। मंचन के क्रम में पात्रों के विभिन्न भाव-भङ्गिमाओं, उनकी वेश-भूषादि का आरोप नट-नटी आदि में किया जाता है। अतएव नाट्य को ‘रूपक’ कहते हैं। तात्पर्य है - रूपक उसे कहते हैं जहाँ किसी चीज का आरोप किया जाय। नाट्य, रूप, रूपक - सभी एक ही अर्थ का द्योतन करते हैं। रूपक के मुख्यतः दस भेद हैं। कहा भी गया है - ‘‘नाटकं सप्रकरणं ...

भर्तृहरि का नीतिशतक

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         Dr. D.K.MISHRA,            HOD SANSKRIT,      S K M UNIVERSITY DUMKA, JHARKHAND  नीतिशतक संस्कृत साहित्य का एक अनुपम ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ के रचयिता भर्तृहरि हैं। नीतिशतक जितना विख्यात और प्रचलित ग्रन्थ है इसके रचयिता भर्तृहरि का व्यक्तित्व उतना ही किंवदन्तियों से घिरा अप्रमाणिक और अपुष्ट है। दन्तकथा के अनुसार भर्तृहरि को राजा विक्रमादित्य का बड़ा भाई माना जाता है। कुछ लोग नीतिशतक के रचयिता भतृहरि और वाक्यपदीय के रचनाकार महावैयाकरण भर्तृहरि को एक मानते हैं तो कुछ लोग अलग। कोई पुष्ट प्रमाण नहीं मिलने के कारण इस विषय पर अधिक कहा नहीं जा सकता है। इनके समय के बारे में भी स्पष्टतः कुछ कहा नहीं जा सकता। भतृहरि के सम्बन्ध में एक कथा प्रायः यह कही जाती है कि राजा भर्तृहरि अपनी पत्नी के आचरण से रुष्ट होकर संन्यासी हो गये और अपना राजपाट अपने छोटे भाई विक्रमादित्य को सौंप दिया। नीतिशतककार भर्तृहरि ने तीन शतकग्रन्थों की रचना की है जो श्रृंगारशतक, वैराग्यशतक और नीतिशतक के नाम से प्रसिद्ध है। इनके शतकग्रन्थों के अध्ययन ...

जयदेव कृत गीतगोविन्दम्

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Dr. D K MISHRA  HOD SANSKRIT  S K M UNIVERSITY DUMKA                         संस्कृत-गीति काव्य की परम्परा में महाकवि जयदेव का विशिष्ट स्थान है। इन्होंने गीतगोविन्द काव्य की सृजना की है। कृष्णलीला पर रचित गीतगोविन्द एक मौलिक, ललित एवं गेय कृति है। यह जयदेव की लोकप्रिय रचना है। जयदेव बंगाल के राजा लक्ष्मणसेन के आश्रित कवि थे। ये किन्दुबिल्व निवासी भोजदेव के पुत्र थे। इनकी माता का नाम रामादेवी था। महाकवि जयदेव राजा लक्ष्मणसेन की राजसभा के प्रमुख रत्न कहे जाते हैं। एक श्लोक इस बात को सिद्ध भी करता है- ‘‘ गोवर्द्धनश्च शरणो      जयदेव उमापतिः। कविराजश्च रत्नानि समितौ लक्ष्मणस्य च।। ’’ इतिहासकार ग्यारहवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध जयदेव का समय निर्धारित करते हैं।               गीतगोविन्द में 12 सर्ग हैं। प्रत्येक सर्ग गीतों से समन्वित हैं। सर्गों को परस्पर मिलाने के लिए तथा कथा के सूत्र को बतलाने के लिए कतिपय...

पंचमहायज्ञ

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प्रस्तुति: डाॅ0 धनंजय कुमार मिश्र विभागाध्यक्ष, संस्कृत विभाग सिदो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय, दुमका (झारखण्ड) ---------- वैदिक साहित्य की परम्परा में संहिताओं और ब्राह्मण ग्रन्थों की रचना के बाद आरण्यकों की रचना हुई। ब्राह्मण साहित्य की रचना के बाद ये आरण्यक उनके पूरक के रूप में प्रस्तुत हुए। आरण्यकों के मुख्य प्रतिपाद्य विषय भी ब्राह्मणों की तरह यज्ञीय कर्मकाण्ड ही है। वर्तमान समय में उपलब्ध सात आरण्यकों में तैत्तिरीय आरण्यक एक महत्त्वपूर्ण आरण्यक है, जो कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा से सम्बन्धित है। इसके दश प्रपाठकों में दूसरा प्रपाठक सहवै प्रपाठक है, जिसमें पंच महायज्ञों का वर्णन है।    यज्ञ शब्द यज् धातु से निष्पन्न हुआ है, जो देव पूजा, संगतिकरण एवं दानार्थक है। देवों के प्रति श्रद्धा एवं पूजनीय भावना , यज्ञ काल में उनके निकटता का अनुभव तथा उनके लिए द्रव्य, मन एवं प्राण को समर्पित कर देना यज्ञ कहलाता है। भारतीय संस्कृति यज्ञ प्रधान थी। ऋग्वेद में भी कहा गया है - ‘‘यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवा तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्।’’ अर्थात् यज्ञ से ही विश्व की उत्पत्ति हुई है, यही जगत...