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Showing posts from July, 2025

एकादश रुद्र : भगवान शिव के ग्यारह अद्भुत रूप

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 *एकादश रुद्र : भगवान शिव के ग्यारह अद्भुत रूप*   प्रस्तुति: डॉ धनंजय कुमार मिश्र  विभागाध्यक्ष संस्कृत  सिदो-कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय दुमका, झारखंड  "ॐ नमो भगवते रुद्राय" जब वेद की ऋचाओं में ‘रुद्र’ का आह्वान होता है, तब वह केवल किसी एक देवता का नाम नहीं होता, वरन् वह विराट ब्रह्म की उन शक्तियों की पुकार होती है, जो सृष्टि को संचालित करती हैं — आश्रय देती हैं, शुद्ध करती हैं और अज्ञान का संहार कर आत्मबोध की ओर ले जाती हैं। इन्हीं दिव्य शक्तियों का नाम है — एकादश रुद्र। एकादश रुद्र शिव की महाशक्ति के अंश हैं। ‘रुद्र’ नाम का प्रथम उल्लेख वेदों में आता है — वह तेजस्वी, उग्र, किन्तु करुणामय रूप जो चिकित्सा का अधिपति भी है और विध्वंस का कारण भी। पुराणों ने इस रुद्र रूप को विस्तार देते हुए शिव के ग्यारह रूपों की कल्पना की, जो शिव के ही विभिन्न आयाम हैं। ये एक ओर जहाँ संहार के प्रतीक हैं, वहीं दूसरी ओर आध्यात्मिक चेतना और कल्याणकारी ऊर्जा के भी अधिष्ठाता हैं। शिवपुराण में वर्णित एकादश रुद्र निम्नलिखित हैं — 1. कपाली — मुण्डमालाधारी, मृत्यु और मोक्ष के पारदर्शक। 2. ...

सावन शिव

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  जुलाई 21, 2025. प्रभात खबर दुमका 

शिव : शून्य से पूर्णता तक

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 *"शिव  : शून्य से पूर्णता तक"* शुरुआत वहीं से होती है, जहाँ कुछ भी नहीं होता...। जब सृष्टि नहीं थी, जब शब्द भी मौन था, जब काल का चक्र भी स्थिर था — तब भी शिव थे। शिव का अर्थ ही है — कल्याण, शुभता, शांति और अनंत चेतना। वे न आदि हैं, न अंत। वे न केवल एक देवता हैं, बल्कि संपूर्ण भारतीय दर्शन की आत्मा हैं। शैव दर्शन का अर्थ है — शिव के माध्यम से सृष्टि, आत्मा और मोक्ष को समझने की कोशिश। यह दर्शन कहता है — "शिव ही ब्रह्म हैं, और वही आत्मा भी हैं।" शिव न कहीं बाहर हैं, न किसी मंदिर में बंद हैं। वे हर जीव में, हर कण में, हर श्वास में हैं। वे निर्गुण भी हैं, सगुण भी। वे ध्यान में स्थिर हैं — पर नटराज बनकर तांडव भी करते हैं। वे भस्म रमाने वाले वैरागी भी हैं — और पार्वती के साथ गृहस्थ जीवन जीने वाले योगी भी। शिव का रूप एक जीवंत प्रतीक है। शिव का हर रूप एक संदेश है - त्रिनेत्र – ज्ञान, चेतना और भविष्य की दृष्टि। गंगा जटाओं में – जीवन को संतुलित करने की कला। सर्प हार में – भय से परे होने का प्रतीक। चन्द्रमा – सौम्यता और शीतलता। त्रिशूल – इच्छा, क्रिया और ज्ञान की शक्ति। तुलसीद...

"रुद्राष्टकम्” – केवल स्तुति नहीं, एक आत्म-प्रस्फुटन है…

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 *“रुद्राष्टकम्” – केवल स्तुति नहीं, एक आत्म-प्रस्फुटन है…*   डॉ धनंजय कुमार मिश्र*  ___________ श्रीरामचरितमानस के रचयिता महाकवि गोस्वामी तुलसीदास केवल राम के परमभक्त नहीं थे, वे आत्मज्ञानी संत थे, जिनके हृदय में राम और शिव समान भाव से निवास करते थे। "रुद्राष्टकम्" की रचना न केवल एक स्तुति है, यह तुलसीदास के अपने जीवन के एक गहन अनुभव की भावनात्मक परिणति है। मान्यता है कि जब तुलसीदास वाराणसी में श्रीकाशीविश्वनाथ के दर्शन हेतु आए, तो वहाँ उन्होंने भगवान शिव की भव्य स्वरूप को देखकर हृदय से प्रणाम किया। उनके मुख से स्वतः निकला — "नमामीशमीशान निर्वाणरूपं…" और एक के बाद एक श्लोक, जैसे कोई भीतर की नदी उमड़कर बाहर बह निकली हो। वे उस क्षण भाव-विभोर थे। आँखें अश्रुपूरित, स्वर में कम्पन और अंतरात्मा में शिव का साक्षात् अनुभव। शिव के विराट, निर्विकार, दयालु और सबको तारने वाले स्वरूप को जब उन्होंने प्रत्यक्ष अपनी चेतना में अनुभव किया, तब रुद्राष्टकम् का सृजन एक भावावेश बन गया। शिवजी की कृपा से ही तुलसीदास को रामकथा की रचना का आदेश प्राप्त हुआ था। एक प्रसंग के अनुसार, तुलसीदास ज...

विद्यापति और उगना महादेव

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 *विद्यापति और उगना महादेव की कथा : भक्ति, करुणा और कृपा की अमर गाथा* मिथिलांचल की धरती पर अनेक ऋषियों, कवियों और भक्तों ने जन्म लिया, परन्तु विद्यापति जैसा भक्त विरला ही होता है, जिसकी भक्ति ने स्वयं भगवान को अपने पास बुला लिया। यह कथा न केवल भगवान शिव के कृपालु स्वभाव की साक्षी है, अपितु यह दर्शाती है कि सच्ची प्रेमभक्ति के आगे देवताओं की भी वंदनशीलता अनिवार्य हो जाती है। लोकविश्वास में प्रसिद्ध है कि भगवान शिव, विद्यापति की अखंड और आत्मगर्भित भक्ति से इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने स्वयं उनके गृह-भृत्य बनने का संकल्प कर लिया। वे 'उगना' नामक एक साधारण ग्वाले के वेश में उनके घर आ पहुँचे और सेवा का दायित्व ग्रहण किया। कौन जानता था कि यह साक्षात् कैलासपति अपनी जटाओं और त्रिशूल को त्याग कर, भक्त के गृह में अपने को समर्पित कर रहे हैं? एक दिन की बात है। तेज धूप में यात्रा करते हुए विद्यापति को तीव्र प्यास लगी। जल कहीं उपलब्ध न था। उन्होंने उगना से जल माँगा। उगना एक क्षण चुप रहा, फिर अपने केशों को झटकते हुए अपनी जटाओं से निर्मल गंगाजल निकालकर विद्यापति को अर्पित कर दिया। विद्यापति चकि...

बोल बम यात्रा : श्रद्धा, साधना और शिवत्व का सामूहिक उत्सव

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 बोल बम यात्रा : श्रद्धा, साधना और शिवत्व का सामूहिक उत्सव प्रस्तुति : डॉ. धनंजय कुमार मिश्र (अध्यक्ष, संस्कृत विभाग, सिदो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय, दुमका) --- श्रावण मास का आगमन मात्र ही प्रकृति में भक्ति की सुवास भर देता है। नदियाँ गुनगुनाने लगती हैं, बादल शिव-ध्वनि में रमने लगते हैं और दिशाएँ “हर-हर महादेव” की प्रतिध्वनि में नत हो जाती हैं। ऐसे ही माह में आरंभ होती है— बोल बम यात्रा— एक तप, त्याग, त्राण और त्रिविध भक्ति का सामूहिक उत्सव, जो भारत की आध्यात्मिक चेतना का जीवंत प्रतीक है। *श्रद्धा की अग्नि-रेखा* झारखंड के देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम तक पहुँचने की यह यात्रा कोई सामान्य तीर्थयात्रा नहीं, यह तो आत्मा की तीव्र पुकार है। श्रद्धालु सुल्तानगंज से गंगा जल लेकर लगभग 105 किलोमीटर की दूरी नंगे पाँव तय करते हैं। शरीर थकता है, पाँव छिलते हैं, पर “बोल बम! हर-हर महादेव!” की दिव्य ध्वनि इस समस्त कष्ट को साधना में बदल देती है। यह यात्रा एकांत नहीं, यह तो सामूहिक साधना है — जहाँ हर कांवड़िया एक चलती-फिरती आरती बन जाता है। *पौराणिक गाथा : जब रावण ने अर्पित किया अपना सिर* बाबा बैद...

पावन सावन और शिव का स्वरूप

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 🔱 पावन सावन और  शिव का स्वरूप 🔱 — डॉ. धनंजय कुमार मिश्र श्रावण मास का आरम्भ होते ही भारतीय जनमानस की आस्था की धारा जैसे गंगोत्री से फूट पड़ती है। यह मास न केवल ऋतु-सौंदर्य का आलंबन है, वरन् परम तपस्वी, भूतभावन, आशुतोष भगवान रुद्र के प्रति समर्पण का चरम अनुष्ठान भी है। वर्षा की हर बूँद में भक्ति की गूंज सुनाई देती है। आकाश में उमड़ते घन, भूमि की शीतलता, वनस्पतियों का हरापन — ये सब प्रकृति की ओर से भोलेनाथ के स्वागत का भावमय अभिनंदन है। शिव को समर्पित यह महीना ऋचाओं, स्तुतियों, अभिषेकों और जलार्पणों से गुंजरित रहता है। विशेष रूप से रुद्राभिषेक और बेलपत्र अर्पण का जो विधान है, वह शिव-भक्ति की शुद्धतम परम्परा का परिचायक है। कहते हैं — "पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति" — जो भक्तिपूर्वक केवल जल ही अर्पित करे, उसे भी प्रभु स्वीकार करते हैं। सावन में रुद्राक्ष का विशेष महत्त्व है। यह केवल एक प्राकृतिक बीज नहीं, वरन् शिव के नेत्रों की अश्रुधारा का प्रतीक है। रुद्राक्ष धारण करना, उसे माला के रूप में जपना, शिव की उपासना का गूढ़ आध्यात्मिक पक्ष है। तांत्रिक परम्पराओं में...